Wednesday, August 17, 2016

बाल मधुमेही- कुछ अनछुए पहलू सामाजिक व मानसिक दृष्टिकोण

बाल मधुमेही- कुछ अनछुए पहलू
सामाजिक व मानसिक दृष्टिकोण
ल रात टी.वी. देखते हुये इसकी आँखें पथरा गई एवं शरीर काँपने लगा। अस्पताल ले जाने के थोड़ी देर बाद ही यह ठीक हो गई। किंतु आज सुबह खून की जाँच में शक्कर बताई है। लेकिन इससे पहले तो मेरी बेटी ठीक थी एवं वर्तमान में वह तीसरी कक्षा की मेधावी छात्रा है। हमारे सारे खानदान में किसी को शुगर नहीं है। इस जाँच की रिपोर्ट पर मुझे तनिक भी भरोसा नहीं है। कृपया आप ठीक से देखें एवं बताएँ। उक्त कथन था टाइप-1 मधुमेह से ग्रस्त गौरी के हकबकाये पिता शिवदयाल का।

खैर! जाँच आदि के बाद बच्ची के बाल मधुमेही होने की पुष्टि हो गई। ‘‘अब इंसुलिन इंजेक्शन ही इसकी जीवनरेखा है। साथ ही समय-समय पर ब्लड शुगर भी चेक करवाते रहें। अन्य किसी भी समस्या के लिए भी तुरंत दिखलाएँ एवं उसे नजर अंदाज न करें।’’ यह कहकर डॉक्टर साहब अपने अगले मरीज में व्यस्त हो गये।

इधर गौरी के माता-पिता तो बेजान से हो गये। मासूम गौरी उनके चेहरे के भावों को देखकर शायद अपनी’’ कमी’’ से परिचित हो गई। रोग लाइलाज नहीं है यह जानते हुये भी गौरी के माता-पिता गहरे अवसाद में डूब गये। अनेक अनुत्तरित प्रश्न उनके जेहन में कौध रहे थे:- क्या हमारी बच्ची सामान्य बच्चों की तरह विकसित होगी?
  • क्या इसकी आयु कम है?
  • क्या घर के अन्य बच्चों में भी यह रोग फैल सकता है?
  • क्या अब वह स्कूल जा सकेगी, पढ़ सकेगी या खेल सकेगी?
  • क्या वह रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन के दर्द को सहन कर सकेगी?
  • पता नहीं यह इलाज कितना खर्चीला होगा, कब तक चलेगा?
  • इससे विवाह कौन करेगा?क्या यह सामान्य बच्चों को जन्म दे सकेगी?

बच्चों में मधुमेह (टाईप-1 डायबिटीज) वास्तव में एक जटिल समस्या है। इसका इलाज इंसुलिन इंजेक्शन, परहेजी भोजन के साथ रोगी को समुचित सामाजिक एवं मानसिक संरक्षण के द्वारा ही सफलतापूर्वक किया जा सकता है। मात्र इंसुलिन इंजेक्शन तक सीमित न रहकर वास्तव में स्वास्थ्य सेवी संगठनो को बाल मधुमेही के लिए सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक संरक्षण देने की दिशा मे भी पहल करनी चाहिए। सामाजिक संरक्षक दल में कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता, नर्स, चिकित्सक, पेरामेडिकल कार्यकर्ता, नेतागण, घर के सदस्य, पडोसी, अन्य मरीज या अन्य कोई भी मित्र व हितैषीगण हो सकते है। भावनात्मक व सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही ये संगठन समाज में डायबिटीज रोग के बारे मे जागरूकता फैलाते है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर मरीजो के सहायतार्थ धन एवं फ्री इंसुलिन आदि उपलब्ध कराने हेतु सामाज के धनाढय वर्ग की सहायता से ट्रस्ट की स्थापना की जा सकती है।
मधुमेह पता चलने के बाद मानसिक तनाव
इस रोग के होने का पता चलने के तुरन्त बाद अधिकतर मरीज इस सत्य का सामना सामान्य रूप से नही कर पाते वे तनाव ग्रस्त हो जाते है। कुछ बच्चों मे तो नर्वस ब्रेक डाउन या डिपे्रशन की समस्या देखी जाती है। परन्तु साल -छह महीने बीतते, सब कुछ सामान्य हो जाता है। कुछ बच्चो मे नीद न आना चिड़चिड़ापन, अन्य बच्चो से कम घुलना-मिलना, बातचीत करने में झिझकना आदि लक्षण देखे जाते है।
मधुमेह के साथ बड़ा होना एक चुनौती
वास्तव में मधुमेह एवं मानसिक परिवर्तनों का चोली दामन का साथ है। बार-बार शुगर कम होना (हाइपो मे जाना) बच्चो के मानसिक विकास में बाधक हो सकता है। साथ ही यह स्नायु तंत्र (Nervous System) एवं शरीर की अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं पर भी दुष्प्रभाव डालता है। नतीजतन आंख का पर्दा खराब होना (रेटिनापैथी) गुर्दा खराब होना (नेफ्रोपैथी) पैर में सुन्नपन आना (न्यूरोपैथी) जैसी जटिलताएं असमय सामने आने लगती है। किशोर एवं युवा वर्ग में हार्मोन्स की वजह से होने वाले सामान्य परिवर्तन, उत्सुकता एवं तनाव को जन्म देते है। ऐसे मे मधुमेह ग्रस्त युवा दोहरे मानसिक तनाव को झेलते है। खेल-कुछ, योग-ध्यान, व्यायाम के लिए विशेष रूप से बच्चो को प्रोत्साहित करें। ये क्रीड़ायें स्वाभाविक रूप से ब्लड शुगर कम करती है। इससे बच्चो में स्फुर्ति, आशा एवं आत्म विश्वास का संचार होता है। साथ ही हीन भावना नष्ट होती है। परन्तु बच्चो को खेल के दौरान लगने वाली चोटो पर अवश्य ध्यान दें। उन्हे समझायें कि जुते-चप्पल पहन कर ही खेलना सुरक्षित तरीका होता है।
शिक्षा मे कोई कमी न आने दें -
बाल मधुमेही की बीमारी का वास्ता देकर उसे स्कूली शिक्षा से वचिंत रखना घोर अपराध है। कुछ स्कूल एवं अध्यापक रोग ग्रस्त बच्चो को एडमीशन देने से कतराते है। वास्तव में ऐसा मधुमेह सम्बंधी उचित जानकारी के अभाव में होता है। बीमारी एवं अनुपस्थिति के दिनो को हटा दे तो आम तौर पर ये बच्चे अच्छे विद्यार्थी साबित होते है। उच्चशिक्षा क्षेत्र, खेलकूद के क्षेत्र एवं अन्य व्यवसायों में ये बच्चे नाम एवं धन अर्जित कर रहे है। स्वामी विवेकानन्द, हालीबुड अभिनेत्री हैलीमेरी, स्टार क्रिकेटर वसीम अकरम आदि साहसिक टाइप-1 मरीजो के ज्वलंत उदाहरण हैं। सच ही कहा है- ‘‘हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा’’।
परिवार की भूमिका
बाल मधुमेही के सारे परिवार पर किसी न किसी रूप में नाकारात्मक मानसिक प्रभाव देखा जा सकता है। बच्चे की मां को भी बीमारी का पता चलने के बाद मानसिक तनाव व अवसाद की स्थिति से उबरने मे लगभग 4-6 महीने का समय लग जाता है। इस बच्चे की देख भाल का मुख्य दायित्व मां के कन्धो पर होता है। ऐसे में जाहिर है अन्य बच्चों की देखभाल व घर के कामों का भी बोझ उठाना मुश्किल होता है। परिवार के अन्य सदस्यों पर बालमधुमेही की देख भाल एक विशेष जिम्मेदारी है। घर के अन्य सदस्यों की तुलना में जाने -अनजाने बालमधुमेही स्वयं को अलग श्रेणी में खड़ा पाते है।
बालमधुमेही यानि सारा जीवन नपा-तुला भोजन, रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन, ब्लड शुगर की जांच, व्यायाम आदि । परन्तु माता -पिता की आपसी समझ, घर का तनाव रहित एवं सौहार्द पूर्ण वातावरण, बेहतर वैचारिक आदान-प्रदान एवं रोग ग्रस्त बच्चे के जीवन को बेहतर बनाने का सामूहिक लक्ष्य, रोगी को मानसिक रूप से बेहतर बनाने का सामूहिक लक्ष्य, रोगी को मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाकर इस समस्या का मुकाबला करने में सहायक होता है। स्वस्थ टाईप-1 मरीज अक्सर सामान्य सम्बन्ध बनाते है। यहा पर ‘‘ स्वस्थ्य’’ शब्द नियंत्रित मधुमेह एवं अच्छे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का परिचायक है।घर का साकारात्मक वातावरण भी रोगी के व्यवहार व बात चीत पर प्रभाव डालता है।
वैवाहिक जीवन
सकारात्मक परिवार के बाल मधुमेही आत्म विश्वासी किशोर एवं युवा होते है। ये समान्य वैवाहिक जीवन व्यतीत करते है। इनके रोग सम्बधी सारी जानकारी जीवनसाथी एवं उसके परिवार वालों को होना चाहिये। विवाहोपरांत संतान प्राप्ति की राह थोडी़ कठिनाईयों से भरी हुई हैं। नियमित चिकित्सकीय परामर्श एवं सजगता से इनका भी मुकाबला किया जा सकता है। आत्मविश्वास(Self Confidence) एवं अपने स्वास्थ्य के प्रति रहने वाले बच्चों में शुगर कंट्रोल प्रायः अच्छा रहता है एवं इस रोग की जटिलताएँ भी कम हो जाती है। मधुमेह सम्बंधी जानकारी पत्रिकाओं के माध्यम से प्राप्त करने से रोग सम्बंधी भ्रांतियाँ तों दूर होगी साथ ही आत्म विश्वास भी जागेगा।
खान-पान एक समस्या
चॉकलेट,मिठाई फास्ट फूड एवं होटल आदि का खाना नही खाने की हिदायतों से तगं आकर कभी-कभी रोगी बगावत भी कर देते है। परन्तु अक्सर यह बगावत महगी पड जाती है अत: खान पान में सदैव सतर्कता बरतें। साथ ही समय समय पर डायटीशियन से मशवरा शुगर कंट्रोल में सहायक सिद्ध होता है।
फियर फैक्टर (Fear Factor)
रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन की चुभन का एहसास व शुगर की जाँच के समय खून निकलने का भय मरीज पर मानसिक दबाव डालता है। यह स्थिति उन्हे स्वंय इंजेक्शन लेने एवं जाँच करने से रोकती है एवं आत्मनिर्भता की दिशा में बाधक है।
काँटो भरी राह
मधुमेह की जटिलताओं से भरा जीवन रोगी के लिये शारीरिक एवं मानसिक परेशानी का सबब बन सकता है। ये जटिलताये मधुमेही को सदैव याद दिलाती है कि भरसक प्रयास के पश्चात भी वे इस रोग के सामने विवश है एवं यह भावना मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) पैदा करती है। अनियंत्रित मधुमेह अपर्याप्त पारिवारिक संरक्षण, बीमारी को शारीरिक कष्ट, आर्थिक असुरक्षा, इन रोगियों में तनाव व कुंठा की भावना पैदा करता है।
आशा की ज्योति
इंसुलिन के आविष्कारक सर फ्रेडरिक बेंटिंग के पुश्तैनी मकान जिसमें रहते हुये उनके मन में इंसुलिन का विचार पनपा था के ठीक सामने प्रज्जवलित ‘‘फ्लेम ऑफ होप’’ (Flame of Hope) वास्तव में पीढ़ियों से वैज्ञानिकों व चिकित्सकों के लिये प्रेरणा का श्रोत बनी हुई है। मधुमेह से मुक्ति का उपाय (Permanent Cure) ज्ञात होते ही इस ज्योति को बुझा दिया जायेगा........तब तक शायद इंसुलिन ही बाल मधुमेही मरीजों के लिये एकमात्र आशा .......।

मधुमेह - मनोवैज्ञानिक पहलू

मधुमेह - मनोवैज्ञानिक पहलू

कोई भी लम्बे समय तक चलने वाला रोग एक तनाव (Stress) के रूप में कार्य करता है। मधुमेह एक दीर्घकालिक रोग है अतः यह भी एक तनाव के रूप में रोगी के मनोविज्ञान को प्रभावित करता है। रोग ज्ञात होने के क्षण से लेकर आजीवन वह विभिन्न मनः स्थितियों से गुजरता है। आप सभी क्लब के सदस्य इस सत्य से भली भांति परिचित होंगे। मैं जो कुछ भी कहने जा रही हूँ, आप पायेंगे कि जैसे आप के विषय में ही बात की जा रही है।
रोग निदान पर प्रारम्भिक प्रतिक्रिया:

  1. अस्वीकृति (Denial)
  2. क्रोध (Anger)
  3. अपराध बोध (Guilt)
  4. नैराश्य (Depression)
  5. स्वीकारोक्ति (Acceptance)

प्रथम बार संज्ञान में आने पर रोगी की सामान्य प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है। नहीं, नहीं, मुझे यह रोग नहीं हो सकता, अवश्य ही रिपोर्ट बदल गयी होगी, यह पैथालोजी क्लिनिक विश्वसनीय नहीं है, इस प्रकार की प्रतिक्रिया आम है। अधिकांशतः व्यक्ति किसी दूसरे क्लिनिक से पुनः जांच कराता है। कई बार इस कडुए सत्य को स्वीकार करने में काफी वक्त लगता है। एक बार व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकारने के लिए जब बाध्य हो जाता है तो उसकी अगली प्रतिक्रिया क्रोध की होती है, और यह एक स्वस्थ और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, क्योंकि उसे अपने जीवन-शैली में आजीवन व्यापक परिवर्तन करने होते हैं। व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, बात-बात में झल्लाना, तुनक मिजाज हो जाना उसका स्वभाव बन जाता है।
हे भगवान! यह तूने किस बात का दण्ड दिया? ऐसे कौन से पाप कर्म मैंने किये थे कि यह रोग मुझे हो गया? मैं ही क्यों? इस प्रकार के प्रश्न मन में घुमड़ने लगते हैं। सभी मनुष्य कुछ न कुछ गलत कार्य अवश्य करते हैं। इन्हीं को सोचकर व्यक्ति के अन्दर अपराध-बोध घर करने लगता है कि अवश्य ही मेरे उन कर्मों का दण्ड मुझे मिला है।
अन्ततः व्यक्ति अवसाद या नैराश्य की अवस्था में आ जाता है। सामाजिक रूप से अपने को काट लेता है, हर वक्त सोचता रहता है। इन सारी स्थितियों से होते हुए व्यक्ति धीरे-धीरे इस बीमारी होने के सत्य को स्वीकारने लगता है। उसकी मुलाकात अन्य रोगियों से भी होती है, उसे लगता है कि वह अकेला ही पीड़ित नहीं है। यदि उसे उचित मार्ग दर्शन करने वाला चिकित्सक, सलाहकार या ऐसी संस्था जो इस कार्य में लगी हुई है का सहयोग प्राप्त हो जाता है तो वह शीघ्र ही इस निराशा की स्थिति से निकल कर इस चुनौती से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाता है।
इस पूरे चक्र में कभी-कभी एक वर्ष तक का समय लग जाता है। यह समय इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी के इस रोग के होने के पश्चात् कंट्रोल करने के उपाय आदि के बारे में उचित जानकारी कितनी जल्दी मिल जाती है।
टाइप-1 मधुमेह रोगी बच्चे इस मामले में अधिक मनोवैज्ञानिक लचीलापन रखते हैं। एक अध्ययन के अनुसार 36% बच्चों ने रोग निदान के 3 माह के भीतर मानसिक तनाव के लक्षणों का प्रदर्शन किया अधिकांश के साथ ‘‘सामंजस्य’’ की समस्या आई। बच्चों को इसे स्वीकार करने, अपने गतिशील बाल्य काल के साथ पटरी बैठाने एवं नियमित इन्सुलिन इन्जेक्शन लेने के बीच सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है। ऐसे में परिवारजन, स्कूल के अध्यापक एवं सहपाठियों का सहयोग एवं रवैया काफी अहमियत रखता है। जिस परिवार में कोई बच्चा मधुमेह रोगी हो जाता है, उस परिवार के सदस्यों में भी तनाव के लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, विशेष कर माँ-बाप में। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा, यदि लड़की है तो शादी का क्या होगा, भगवान ने मेरे बच्चे को ही यह रोग क्यों दिया आदि प्रश्न मन-मस्तिष्क को मथने लगते हैं। बच्चे के साथ माता-पिता को भी इसे स्वीकारने एवं सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है।
एक बार स्वीकारोक्ति हो जाने के बाद चिकित्सा की जाती है। बिना शारीरिक श्रम किये, जीवन- शैली में व्यापक बदलाव किये यदि यह रोग समाप्त हो जाये तो क्या कहने! बार-बार इस रोग के कारण के बताने एवं यह समझाने पर भी कि फिलहाल व्यक्ति किसी चमत्कार की आशा में रहता है। जैसे ही उसे कोई बताता है कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति इसका शर्तिया इलाज करता है, वह वहां भागा हुआ जाता है। यह भाग-दौड़ कई बार जीवन पर्यन्त बनी रहती है। कुछ लोग दो-चार बार धोखा खाकर संभल जाते हैं। किसी चिकित्सा पद्धति में इस रोग को समाप्त करने की औषधि नहीं है, और जीवन भर नियमित चिकित्सा में रहना होगा।
दूसरी मानसिकता जो इसके इलाज में बाधक होती है, वह है दवाओं का अंग्रेजी और देशी होना। रोगी भले ही आधी गोली पर नियंत्रित क्यों न हो, वह देशी के चक्कर में कितनी भी दवा खाना पसन्द करता है, और बार-बार अपनी चिकित्सा से छेड़छाड़ करता है। यदि खाने की दवाओं से रोग पर समुचित नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, और रोगी को इन्सुलिन लेने की सलाह दी गई, तब वह एक बार पुनः तनाव में आ जाता है। इन्सुलिन न लेना पड़े इसके लिए वह तमाम तरह के तर्क गढ़ लेता है। एक बार लगा लूँगा तो फिर केाई दवा काम नहीं करेगी, इन्सुलिन लेने से आयु घट जाती है, जिसने भी इन्सुलिन लिया शीघ्र ही मर गया, यह चरस है, एक बार लगा तो छूटता नहीं है, इत्यादि धारणायें आम हैं। कई बार चिकित्सक भी रोगी कहीं और न चला जाय इस डर से इन्सुलिन लगाने की सलाह देने से घबराते हैं। अधिकांश रोगी तब तक इन्सुलिन टालते रहते हैं जब तक कोई जटिलता सामने आ खड़ी नहीं होती और तब ‘‘मरता क्या न करता’’ वाली मनः स्थिति में इन्सुलिन लेते हैं, और एक बार थोड़ा स्वस्थ होने पर बिना चिकित्सीय सलाह से इन्सुलिन छोड़ देते हैं।
चूँकि यह दीर्घकालिक रोग है और पूरे शरीर को प्रभावित करता है अतः भविष्य में होने वाली जटिलताएं पुनः एक बार तनाव का कार्य करती हैं और व्यक्ति पहले बताए गये अवस्थाओं से गुजरने लगता है।
रोग के इस मनोवैज्ञानिक पहलू से निपटने के लिए योग्य मनोवैज्ञानिक सलाहकार की मदद मिलनी चाहिए जिसे ‘काउन्सलर’’ कहा जाता है। भारत में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की अवधारणा की सामाजिक स्वीकारोक्ति अभी नहीं हो पायी है, और यह सारे कार्य चिकित्सक को ही करने पड़ते हैं जो रोगियों की संख्या के कारण इसे सक्षम रूप से सम्पादित नहीं कर पाता। ऐसे में ‘‘डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब’’ जैसी संस्था काफी सशक्त रूप से इस कमी को पूरा कर सकते हैं।
क्लब के वरिष्ठ सदस्य जो इस अवस्थाओं से गुजर चुके हैं नये रोगियों के लिए मनोवैज्ञानिक सलाहकार का कार्य कर सकते हैं, ताकि रोगी नैराश्य से निकल कर शीघ्र-अतिशीघ्र इस चुनौती का मुकाबला करने में सक्षम हो सके।
डा0 विद्यावती
रीडर, मनोविज्ञान विभाग
सेण्ट एण्ड्रयूज कालेज, गोरखपुर
न्यायिक सदस्य ‘किशोर न्याय बोर्ड’

मधुमेह -समस्या की प्रबलत

मधुमेह -समस्या की प्रबलता

दीर्घकालिक रोगों में जो समय के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को क्षति पहुचातें है, मधुमेह प्रमुख है। यह एैसा रोग है जिसका तात्कालिक प्रभाव अधिकांश रोगियों में देखने को नहीं मिलता, और लम्बे समय तक पीड़ित व्यक्ति को इस बात का आभास नही होता कि वह इससे ग्रसित है और किसी शारीरिक अंग-यथा गुर्दे, आँख, हृदय आदि के प्रभावित होने के फलस्वरूप होने वाले लक्षण आने के पश्चात ही इस रोग का संज्ञान हो पाता है। संक्रामक रोगों पर नियंत्रण के पश्चात मधुमेह एक वैश्विक महामारी के रूप में उभर कर सामने आया है, जो तत्काल क्षति पहुचाने के बजाय एक दीमक की तरह आने वाले समय में हमारे मनुष्य जगत को खोखला करने वाला है। इसमें भी टाइप - 2 मधुमेह रोगियों की संख्या में सर्वाधिक इजाफा होने वाला है जो 30 वर्ष से उपर की आयु के लोगो को अपने चपेट में लेता है। यद्यपि कि पिछले कुछ वर्षो से अब 30 वर्ष से कम आयु के लोगों में भी टाइप - 2 रोगी मिलने लगें है और समस्या की प्रबलता घटने के बजाये बढ़ती जा रही है और यह अत्यन्त चिन्ता का विषय है। यही आयु मनुष्य का सर्वाधिक क्रियाशील और विभिन्न सामाजिक पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाला काल होता है निश्चय ही यह न केवल व्यक्ति के अपने कार्यक्षमता को क्षति पहुंचायेगा, वरन सरकार और देश के बहुमूल्य स्वास्थ सेवाओं और आर्थिक संसाधनो को भी निचोड़ेगा। बेहतर होती चिकित्सीय सुविधाओं से लोगों की औसत आयु पिछले 40 वर्षो में 59 वर्ष से बढ़कर 64 वर्ष हो गई है। मधुमेह के सन्दर्भ में इसका अर्थ होगा मधुमेह जनित जटिलताओं से पीड़ित जनसंख्या में वृद्धि और अपेक्षित संसाधनों में तुलनात्मक कमी।

इण्टरनेशनल डायबीटीज फेडेरेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘डायबीटीज एटलस’ के तृतीय संस्करण के माध्यम से आइये देखते है कि इस समस्या की प्रबलता कितनी है यह सभी आकड़े 20 से 79 वर्ष के आयु के है। सन् 2007 के आंकड़े बताते है कि विश्व स्तर पर 24.6 करोड़ लोग (आबादी का 5.9%) मधुमेह से पीड़ित थे, जिनकी संख्या 2025 में बढ़ कर 38 करोड़ (आबादी का 7%) हो जायेगी। करीब करीब 55% की बढोत्तरी होगी।
सन् 1994 में अनुमान लगाया गया था कि 2010 में मधुमेह रोगियों की संख्या 23.9 करोड़ हो जायेगी जबकि 2007 में ही यह संख्या 24.6 करोड़ हो चुकी है, यानि कि हम तीन वर्ष पहले ही अनुमानित आंकड़े को पार कर चुके है, यह अत्यन्त चिन्तनीय है, भारत के सन्दर्भ में यदि हम देखें तो सन् 2007 में मधुमेह रोगियों की संख्या 4.65 करोड़ थी जो 2025 तक बढ़कर 8.83 करोड़ हो जायेगी। करीब-करीब 73% की बढ़ोत्तरी होगी। गौर तलब यह है कि जितने मधुमेह रोगी ज्ञात रूप में सामने होते हैं लगभग उतने ही लोग मधुमेह के कगार पर खड़े होते जिन्हे हम ‘प्री-डायबीटीज’ (Pre-Diabetes) की अवस्था कहते हैं। ‘‘प्री - डायबीटीक को हम आज की तारीख में मधुमेह के घोषित मानक के तत्काल पहले की अवस्था को कहते हैं। सामान्य तौर पर किसी स्वस्थ व्यक्ति का रक्त शर्करा खाली पेट जांच कराने पर 110 मिग्रा. से कम होना चाहिए और 75 ग्राम ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद 140 से कम होना चाहिए। यदि यह खाली पेट 126 या उससे अधिक और ग्लूकोज पीने के 2 घंटे बाद 200 या उससे अधिक हो तो उस व्यक्ति को मधुमेह रोग है। यदि यह खाली पेट 110 से अधिक और 126 के नीचे हो और ग्लूकोज के बाद 140 से 200 के बीच हो तो उसे हम बाधित ग्लूकोज निस्तारण (Impaired Glucose Tolerance; IGT) कहते हैं। एैसे व्यक्ति जो IGT के श्रेणी में आते है उनमें से करीब 70% आगे चलकर मधुमेह रोगी हो जाते है। सन 2007 में जहाँ मधुमेह रोगियों की संख्या 24.6 करोड़ थी वहीं IGT की संख्या 30.8 करोड़ थी। सन् 2025 में IGT की संख्या 41.8 करोड़ हो जायेगी। इस प्रकार यदि हम घोषित मधुमेह रोगियों एवं संभावित मधुमेह रोगियों (IGT) की संख्या जोड़ दें तो समस्या की प्रबलता और भी गंभीर हो जाती है।
यह अफसोस का विषय है कि सन् 1994 में 2010 के लिये जो भविष्यवाणी की गई थी उसे झुठलाने में हम नाकामयाब रहें। सन् 2025 के प्रस्तावित आकड़ो को यदि हमें झुठलाना है और चुनौती देनी है तो हमे गभीरंता पूर्वक आज के युवाओं को जिसकी उम्र 15 से 30 वर्ष के बीच है जागृत करना होगा, क्योकि 17 वर्ष बाद यही वर्ग 32 से 47 वर्ष की आयु में होगा और अधिकांश नये रोगी इसी वर्ग से सामने आयेंगें। अतः आज के बच्चों एवं युवाओं को हमे नियमित व्यायाम, उचित भोजन चयन, एवं जीवन शैली के प्रति न केवल जागरूक करना होगा, वरन सतत् निगरानी भी रखनी होगी और निरन्तर इस पर बल देना होगा। इस के लिये कई स्तर पर प्रयास करने होगें। जैसे पारिवारिक, शिक्षण संस्थाओं, कार्यालय आदि के माध्यम से हमें एक अभियान छेड़ना होगा जिसमें मीडिया की भूमिका भी अहम् होगी।
आइये अब हम यह देखते हैं कि मधुमेह किस प्रकार हमारे चिकित्सीय संसाधनो को चुनौती देगी-

  • मधुमेह रोगियों में मृत्यु दर दो गुनी अधिक है।
  • हृदय आघात की संभावना दो से चार गुनी अधिक है।
  • 17 – 20% रोगियों की मृत्यु 50 वर्ष से कम आयु में।
  • रोग होने के 20 वर्ष पश्चात लगभग सभी टाइप-1 मधुमेह रोगियो में और 60% से अधिक टाइप-2 मधुमेह रोगियों में आँख के पर्दे (रैटिना) में खराबी आ जाती है।
  • 86% टाइप-1 एवं 33% टाइप-2 मधुमेह रोगियों के अंधता का कारण रैटिना पैथी होती है।
  • टाइप - 2 मधुमेह रोगियों में 21% रोगियों को रोग का संज्ञान होने तक रैटिनोपैथी हो चुकी होती है
  • पैरों में सूनापन आने के कारण, पैरों में घाव, गैग्रीन एवं पैरो को कटने (Amputation) की दर में वृद्धि
  • 10-20 वर्ष के पश्चात् लगभग 30-50% टाइप-1 और 20 – 50% टाइप-2

मधुमेह रोगियों के गुर्दे में खराबी (Nephropathy) आ जाती है उन्हे ‘डायालिसिस’ और गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ने लगती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आने वाले समय में अच्छी संख्या में हमारे पास गहन हृदय चिकित्सा केन्द्र, डायालिसिस केन्द्र, नेत्र सम्बन्धी उपचार हेतु उच्चीकृत नेत्र चिकित्सा केन्द्र, पैर चिकित्सा केन्द्र आदि की सुविधा की आवश्यकता पडेगी। केवल चिकित्सा सुविधाओं के उपलब्ध होने से भी काम नहीं चलेगा वरन रोगियों को पैसे भी खर्च करने पडे़गे। संसाधनों के आभाव में सरकारी चिकित्सालयों की जो वर्तमान स्थिति है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अच्छे सुविधायुक्त केन्द्रों पर रोगियों का कितना दबाव होगा।
कालान्तर में श्रम न करने की प्रवृत्ति और उच्च वसा एवं उर्जा युक्त भोजन की प्रचुरता के कारण मधुमेह रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता है उसी प्रकार मधुमेह शहरीकरण, आद्यौगिकीकरण एवं आर्थिक विकास का दर्पण होता है यह कहने में अतिश्योक्ति न होगी।
समस्या की प्रबलता को देखते हुए बड़े पैमाने पर जन - जागरण अभियान की परम आवश्यकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुये डायाबिटीज सेल्फ केयर क्लब निरन्तर अपने मासिक बैठको के माध्यम से इस अभियान में लगा हुआ है और इस वर्ष ‘मधुमेह विजय’ नामक कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न स्कूलो में व्याख्यान एवं पोस्टर प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों के अन्दर इस रोग के प्रति जागरूकता अभियान चलाने जा रहा है। आइये हम सभी संकल्प ले कि इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिये हम अपने प्रयासों में कोई कमी नही आने देंगें।
डा0 आलोक कुमार गुप्ता
एम0डी0

मधुमेहः इतिहास के झरोखे से

मधुमेहः इतिहास के झरोखे से
धुमेह रोग आज सबसे व्यापक रोग के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। शायद ही कोई होगा जो ‘डायबिटिज’, ‘मधुमेह’, ‘शुगर’ की बीमारी से अपरिचित हो। ऐसा भी नहीं कि यह बीमारी प्राचीन युग में नही थी। आइये वर्तमान इतिहास में झाँक कर देखें कि इस बीमारी के बारे में लोगों की जानकारी और धारणायें क्या थीं। इस हेतु हम इतिहास को तीन खण्डों में बाँट कर चलते हैं-

1. प्राचीन युग (600 ए.डी. तक)
इस बीमारी का लिखित प्रमाण 1550 ई.पू. का मिलता है। मिस्र में ‘पापइरस कागज’ पर इस बीमारी का उल्लेख मिलता है, जिसे जार्ज इबर्स ने खोजा था, अतः इस दस्तावेज को ‘इबर्स पपाइरस’ भी कहते हैं। दूसरा प्राचीन प्रमाण ‘कैपाडोसिया के एरीटीयस द्वारा दूसरी सदी का मिलता है। एरीटीयस ने सर्वप्रथम ‘डायाबिटिज’ शब्द का प्रयोग किया, जिसका ग्रीक भाषा में अर्थ होता है ‘साइफन’। उनका कहना था कि इस बीमारी में शरीर एक साइफन का काम करता है और पानी, भोजन, कुछ भी शरीर में नहीं टिकता ओर पेशाब के रास्ते से निकल जाता है, बहुत अधिक प्यास लगती है और शरीर का मांस पिघल कर पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाता है। 400-500 ई.पू. के काल में भारतीय चिकित्सक चरक एवं सुश्रुत ने भी इस बीमारी का जिक्र अपने ग्रन्थों में किया है। संभवतः उन्होंने सर्वप्रथम इस तथ्य को पहचाना कि इस बीमारी में मूत्र मीठा हो जाता है। उन्होंने इसे ‘मधुमेह’ (शहद की वर्षा) नाम दिया। उन्होंने देखा कि इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के मूत्र पर चीटियाँ एकत्रित होने लगती हैं। उन्होंने दो प्रकार के मेह की चर्चा की है-उदक (जल) मेह और इक्षु (गन्ना) मेह जिसे आजकल हम ‘डायबिटीज इनसीपीडस’ और ‘डायबिटिज मेलाइट्स’ के नाम से जानते हैं। इक्षु में दो प्रकार के मधुमेह रोगियों का वर्णन मिलता है-एक वह रोगी जो स्थूलकाय, अधिक खाने वाले, और शिथिल जीवन शैली जीने वाले आरामतलब प्रवृत्त्ति के होते हैं (आज के टाइप-2 रोगी) और दूसरे क्षीणकाय, बहुत अधिक पेशाब करने एवं पानी पीने वाले (आज के टाइप-1 रोगी)। लक्षणों में थकान, सुस्ती, शरीर में दर्द का वर्णन मिलता है। जटिलताओं में न सूखने वाले घाव (Carbuncle) एवं हाथ पैरों में जलन, का वर्णन मिलता है।
नया अन्न, गुड़, चिकनाई युक्त भोजन, दुग्ध पदार्थों का अत्यधिक सेवन, घरेलू जानवरों का मांस भक्षण, मदिरा सेवन एवं विलासपूर्ण जीवन शैली इस रोग के जनक होते हैं। अल्पाहार, शारीरिक श्रम, शिकार करके मांस भक्षण करना आदि उपाय बताये गये हैं। आप कहेंगे कि यह बातें आज भी उतनी ही सत्य है। फर्क इतना है तब पैनक्रियाज एवं इंसुलिन की जानकारी नहीं थी। एरीटीयस एवं गेलन समझते थे विकार गुर्दों में आ जाता है, और यह विचार करीब 1500 वर्षों तक कायम रहा।
2. मध्य-युगीन काल (600-1500 ए.डी.)
इस काल में मुख्य रूप से रोग के लक्षणों का और विस्तार से वर्णन मिलता है। चीन के चेन-चुआन (सातवीं सदी) और अरबी चिकित्सक एवीसेना (960-1037 ए.डी.) ने गैंग्रीन एवं यौनिक दुर्बलता का जिक्र जटिलताओं के रूप में किया है।
3. आधुनिक काल (1500-2004 ए.डी.)
इस काल में रोग के जानने के लिए तमाम प्रयास शुरू हुए। थामस विलिस (1674-75 ए.डी.) ने पुनः मूत्र के मीठेपन को उजागर किया। किन्तु इस मिठास का कारण शर्करा को न मान कर किसी और तत्व को माना। करीब सौ साल बाद 1776 में मैथ्यू डॉबसन ने मधुमेह रोगी के मूत्र को आँच पर वाष्पित कर भूरे चीनी जैसा तत्व अलग किया। उन्होंने यह भी पाया कि रक्त सीरम भी मीठा हो जाता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कलेन (1710-90) ने डायबिटिज में ‘मेलाइटस’ शब्द को जोड़ा। ‘मेल’ का अर्थ ग्रीक भाषा में शहद होता है। इस प्रकार एरीटीयस द्वारा दिये गये शब्द ‘डायबिटिज’ (साइफेन) एवं कलेन द्वारा दिये गये शब्द ‘मेलाइटस’ के संगम से, दो हजार वर्षों से अधिक काल के बाद इस बीमारी का वर्तमान नाम ‘डायबिटिज मेलाइटस’ वजूद में आया।
1850-1950 तक का काल काफी महत्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल में लोगों को वैज्ञानिक सोच में व्यापक बदलाव आया और रोग के मूल कारण को जानने के तीव्र प्रयास हुए। यह दौर ‘प्रयोगिक-विज्ञान का दौर था। तथ्यों एवं परिकल्पनाओं को प्रयोगशालाओं में प्रमाणित करके उसे सत्यापित करने के प्रयास शुरू हुए। 1879 में पॉल लैंगर हेन्स ने सर्वप्रथम अपने शोधपत्र में पैनक्रियाज ग्रन्थि के कुछ विशेष प्रकार की कोशिकाओं का जिक्र किया जो छोटे-मोटे द्वीप-समूहों में बिखरे रहते हैं।
वॉन मेरिंग एवं मिनकोविस्की ने सन् 1889 में दो कुत्तों का पैनक्रियाज ग्रन्थि शल्य क्रिया द्वारा निकाल दिया। अगले ही दिन उन्होंने पाया कि कुत्तों में मधुमेह के लक्षण (बहुमूत्र) उत्पन्न हो गये और उनके मूत्र परीक्षण में शर्करा पाया गया। इस प्रकार वह यह साबित करने में सफल हुए कि मधुमेह का सम्बन्ध गुर्दों से न होकर पैनक्रियाज ग्रन्थि से है। उन्होने देखा कि यदि पैनक्रियाज ग्रन्थि का टुकड़ा स्थापित कर दिया जाये तो जब तक यह टुकड़ा जीवित रहता है, मधुमेह के लक्षण गायब हो जाते हैं। आगे चल कर लैग्यूसे ने यह विचार दिया कि पैनक्रियाज ग्रन्थि में लैंगरहेन्स द्वारा वर्णित कोशिकायें किसी ऐसे तत्व का स्राव करती हैं जो रक्त में शर्करा को नियंत्रित करता है। बाद में जीन-डी0 मेयर ने इस तत्व का नाम ‘इंसुलिन’ रखा।
इस इन्सुलिन नामक तत्व को पैनक्रियाज से अलग करने के प्रयास में कई वैज्ञानिक समूह लगे हुए थे। अन्ततः कनाडा के हड्डी रोग विशेषज्ञ फ्रेडरिक बैटिंग, टोरंटो विश्वविद्यालय के क्रिया-विज्ञान के प्रोफेसर जे0 जे0 आर मैकलियाड, मेडिकल छात्र चाल्र्स बेस्ट एवं बॉयोकेमिस्ट जेम्स कॉलिप ने 1921 में इसमें सफलता पाई। पैनक्रियाज ग्रन्थि द्वारा निकाले गये इस पहले निचोड़ को 11 जनवरी 1922 को लीयोनार्ड थाम्पसन नामक रोगी को दिया गया। इसके बाद इन्सुलिन को शुद्ध और परिष्कृत करने का दौर चला और आज हमें जिनेटिक इन्जीनियरिंग द्वारा ‘मानव इन्सुलिन’ उपलब्ध है।
एक बार इन्सुलिन की जानकारी होने के पश्चात्, शरीर द्वारा इसके निर्माण, नियंत्रण, कार्यविधि, आदि पर तमाम शोधकार्य शुरू हुए और आज भी जारी है। इन शोधों के फलस्वरूप पैनक्रियाज ग्रन्थि पर कार्य कर इंसुलिन का स्राव कराने वाली दवायें, इंसुलिन रिसेप्टर एवं उन पर कार्य करने वाली दवाओं का अविष्कार किया गया। इन दवाओं के पहले इलाज का एकमात्र रास्ता भोजन में व्यापक फेरबदल एवं शारीरिक श्रम था और इनके निष्प्रभावी होने पर धीरे-धीरे घुल कर मरने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता नहीं होता था। अब यदि जीवन शैली परिवर्तन एवं भोजन परिवर्तन के बाद मधुमेह नियंत्रण में नहीं आता है तो हमारे पास तमाम दवायें हैं और जब वह भी निष्प्रभावी हो जाती हैं तो रामबाण के रूप में हमारे पास इंसुलिन होता है जो कभी विफल नहीं होता।
इस प्रकार हम देखते हैं कि करीब पिछले साढ़े तीन हजार साल से मनुष्य ने इस बीमारी पर विजय पाने के लिये कितने प्रयास किये हैं।

मधुमेह- कुछ संभावित प्रश्न

मधुमेह- कुछ संभावित प्रश्न


प्रश्न: मधुमेह क्या है ?

उत्तर: रक्त में ग्लूकोज की मात्रा यदि एक निर्धारित सीमा से अधिक हो जाये तो उसे मधुमेह रोग (डायबिटिज) कहते हैं। रक्त में ग्लूकोज की मात्रा की मानक सीमा इस प्रकार है-

अवस्था

खाली पेट रक्त ग्लूकोज

75 ग्राम ग्लूकोज पीने के 2 घण्टे बाद

मधुमेह≥ 126 मिग्रा. %≥ 200 मिग्रा. %
ग्लूकोज नियंत्रण में कमी≥ 110 मिग्रा. और < 126 मिग्रा.≥ 140 मिग्रा. और < 200 मिग्रा.
सामान्य< 110 मिग्रा. %< 140 मिग्रा. %

प्रश्नः रक्त में ग्लूकोज क्यों बढ़ जाता है ?
उत्तरः मधुमेह रोग में शरीर में इन्सुलिन आवश्यकता से कम बनने लगता है, एवं इन्सुलिन रिसेप्टर शिथिल पड़ने लगते हैं। फलस्वरूप ग्लूकोज समुचित रूप से जल कर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो पाता, इस कारण ग्लूकोज रक्त में बढ़ जाता है।
प्रश्नः ब्लड शुगर एवं मूत्र शुगर क्या अलग-अलग बीमारियाँ हैं ?
उत्तरः मूल बीमारी रक्त में ग्लूकोज (शुगर) का बढ़ना होता है। जब रक्त ग्लूकोज एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तो शरीर उससे छुटकारा पाने के लिए गुर्दों के माध्यम से मूत्र में त्यागना शुरू कर देता है। मूत्र में ग्लूकोज का न होना मधुमेह रोग न होने का प्रमाण नहीं है।
प्रश्नः क्या यह समयबद्ध रोग है?
उत्तरः नहीं! यह जीवन भर का रोग है।
प्रश्नः बढ़े रक्त ग्लूकोज से क्या हानि है? इसे नियंत्रित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तरः बढ़ा हुआ रक्त ग्लूकोज रक्त की रासायनिक गुणवत्ता को प्रभावित करता है। बढ़ा हुआ ग्लूकोज रक्त नलियों की भीतरी दीवार की कोशिकाओं को धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त करता है। इस प्रक्रिया में रोगी को किसी प्रकार का दर्द अथवा कष्ट नहीं होता और वह इससे बेखबर रहता है। एक सीमा से अधिक क्षति होने पर नाजुक अंगों यथा- आंख के पर्दे, हृदय, मस्तिष्क के कार्य प्रभावित होने लगते हैं, और तब रोगी को इसका आभास होता है और वह चेतता है, किन्तु तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यदि रक्त ग्लूकोज को निर्धारित सीमा के अन्दर नियंत्रित न रखा जाए तो यह शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभावित करता है-शारीरिक कष्ट हो अथवा नहीं।
प्रश्नः इसके लक्षण क्या होते हैं ?
उत्तरः इसके निम्न लक्षण हो सकते हैं-
  1. थकान, कमजोरी, पैरों में दर्दः क्योंकि ग्लूकोज ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो पाता है।
  2. जननांगों में खुजली एवं संक्रमण।
  3. बार-बार चश्में का पावर बदलना।
  4. बार-बार गर्भपात होना या सामान्य से अधिक वजन का बच्चा होना।
  5. हृदय आघात, मस्तिष्क आघात का होना।
  6. गुर्दों का निष्क्रिय होना।
  7. पैर का घाव ठीक न होना एवं गैग्रीन का रूप ले लेना।
  8. अधिक पेशाब एवं भूख का लगना तथा तेजी से वजन का गिरना।
  9. प्रारम्भिक अवस्था में कोई लक्षण न होना।

प्रश्नः मधुमेह नियंत्रण का क्या मतलब है ?
उत्तरः रक्त ग्लूकोज को सामान्य के आस-पास रखना चाहिए। विभिन्न वैज्ञानिक शोधों से यह निर्विवादित रूप से सिद्ध हो चुका है कि यदि रक्त ग्लूकोज को नियंत्रित रखा जाये तो इस रोग से होने वाले विभिन्न जटिलताओं से लंबे अरसे तक बचा जा सकता है।
प्रश्नः चिकित्सा का उद्देश्य क्या है ?
उत्तरः चिकित्सा के निम्नलिखित उद्देश्य है:
  1. लाक्षणिक आराम
  2. जटिलताओं में कमी, तथा
  3. अंत तक क्रियाशील जीवन

प्रश्नः चिकित्सा के क्या उपाय हैं ?
उत्तरः मधुमेह चिकित्सा के लिए हमारे पास पांच हथियार हैं:
  1. भोजन
  2. व्यायाम
  3. औषधियां
  4. शिक्षा
  5. नियमित जांच

प्रश्नः मधुमेह रोगी को किस तरह का भोजन लेना चाहिए ?
उत्तरः मधुमेह रोगी का भोजन ऐसा होना चाहिए जो रक्त ग्लूकोज को बढ़ाने से रोके एवं रोग पर अनुकूल प्रभाव डाले। भोजन पौष्टिक होना चाहिए जिसमें कार्बोहाइड्रेट एवं रेशे, प्रचुर मात्रा में हों। भोजन की मात्रा भी शारीरिक श्रम के अनुसार नियंत्रित होना चाहिए।
प्रश्नः व्यायाम ?
उत्तरः यूँ तो व्यायाम की महत्ता स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी है, किन्तु मधुमेह रोग में इसकी विशेष भूमिका होती है। व्यायाम करने से शरीर का वजन कम होता है, पैरों में रक्त का संचार बढ़ता है, हृदय पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है और रक्त ग्लूकोज को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। इन सबसे ऊपर आत्म विश्वास बढ़ता है।
प्रश्नः मधुमेह रोग में दवाओं की क्या भूमिका है ?

उत्तरः सबसे पहले यह अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिए कि दवायें, भोजन एवं व्यायाम का विकल्प नहीं है। दवाओं के नम्बर सदैव इनके बाद आता है। चूंकि मधुमेह रोग शरीर की इन्सुलिन की कमी के कारण है, अतः यदि किसी प्रकार इन्सुलिन की मात्रा बढ़ाई जा सके तो इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोगी को सीधे इन्सुलिन दिया जा सकता है, किन्तु यह केवल ‘सूई’ के रूप में ही उपलब्ध है। इन्सुलिन की मात्रा को बढ़ाने का दूसरा तरीका खाने की दवायें हैं।
प्रश्नः मधुमेह रोगी को किस-किस जांच की आवश्यकता होती है ?
उत्तरः रक्त में बढ़ा हुआ ग्लूकोज पूरे शरीर को प्रभावित करता है, अतः प्रारम्भिक अवस्था में पूरे शरीर की जांच कराना आवश्यक होता है, जिसमें रक्त ग्लूकोज, ग्लाइकोसाइलेटेड हीमोग्लोबिन, रक्त वसा, मूत्र परीक्षण, हृदय, नेत्र परीक्षण इत्यादि जांच कराये जाते हैं।
प्रश्नः रक्त ग्लूकोज के जाँच में किन बातों का ध्यान रखा जाये ?
उत्तरः रक्त ग्लूकोज के जाँच में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जायेः
  1. एक बार दवा की मात्रा का निर्धारण हो जाये तब हर एक-दो माह पर रक्त ग्लूकोज का परीक्षण, खाली पेट और भोजन के दो घण्टे के पश्चात् कराना चाहिए।
  2. जिस दिन जाँच कराना हो उस दिन की दिनचर्या अन्य दिनों की भांति होनी चाहिए।
  3. दवा का सेवन उस दिन भी करना चाहिए।

प्रश्नः हाईपोग्लासीमिया क्या होता है ?
उत्तरः रक्त में ग्लूकोज की मात्रा एक सीमा से कम होने लगे (50 मिग्रा प्रतिशत) तो उसे हाईपोग्लाइसीमिया कहते हैं। इस अवस्था में रोगी का मस्तिष्क ठीक ढंग से काम नहीं करता है, उसे घबराहट, बेचैनी, पसीना होने लगता है। रोगी के आस-पास के लोगों को लगता है कि रोगी ने कोई नशा कर रखा है। ऐसी हालत में तत्काल ग्लूकोज या शर्करायुक्त भोजन न दिया जाये तो रोगी बेहोश हो जाता है, और दिमाग अपूर्णीय रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। अतः मधुमेह रोगियों के दवा की मात्रा अपने आप नहीं घटाना-बढ़ाना चाहिए और न ही बिना डाक्टरी सलाह के उपवास रखना चाहिए। याद रखें मधुमेह रोग दीर्घकालिक रोग है और इसके नियंत्रण में आपकी भूमिका सर्वाधिक है। सुनी सुनाई बातों पर न जाकर अपनी हर शंका का समाधान अपने चिकित्सक से करें और दीर्घकालिक क्रियाशील जीवन जीयें।
प्रश्नः इन्सुलिन का इंजेक्शन कब दिया जाता है ?
उत्तरः इन्सुलिन की आवश्यकता रोगी को दो अवस्थाओं में होती है। पहली अवस्था वह होती है जब खाने की दवायें अपने अधिकतम खुराक में भी प्रभावी नहीं रहती है, यानी की पैंक्रियास ग्रन्थि लगभग पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देती है। ऐसी अवस्था में रोगी को जीवनपर्यन्त इन्सुलिन लेना पड़ता है। दूसरी अवस्था वह होती है, जहां रोगी का रक्त ग्लूकोज खाने की गोलियों या भोजन व्यायाम के माध्यम से नियंत्रण में रहता है, किन्तु कुछ ऐसे कारण उत्पन्न हो जाते हैं जब शरीर को अधिक इन्सुलिन की आवश्यकता पड़ती है, यथा शल्य क्रिया, गर्भावस्था, संक्रामक रोग इत्यादि। ऐसी अवस्था में रोगी को कुछ समय के लिए इन्सुलिन दिया जाता है और उस अवस्था के समाप्त होने पर रोगी पुनः खाने की दवा पर चला जाता है।
प्रश्नः एक बार इन्सुलिन सूई लें तो सदैव इन्सुलिन की सूई लेने की आदत पड़ जाती है। यह कहां तक सत्य है ?
उत्तरः यदि शरीर को किसी चीज की आवश्यकता है तो उसे शरीर को देना पड़ेगा अन्यथा शरीर सुचारू रूप से कार्य नहीं करेगा। जैसे शरीर के लिए भोजन एक अनिवार्यता है तो हम नियमित भोजन करते हैं और कभी यह प्रश्न नहीं करते हैं कि हमें भोजन की आदत पड़ जायेगी, उसी प्रकार यदि शरीर अपनी आवश्यकता के अनुसार समुचित इन्सुलिन का निर्माण नहीं कर पाता तो उसे बाहर से देना पड़ेगा इसमें आदत पड़ने जैसी कोई बात नहीं है।
प्रश्न: भोजन शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर: हमारा शरीर एक मशीन है, जिससे हम विभिन्न कार्य लेते हैं। किसी भी कार्य को करने के लिये ऊर्जा (Energy) की आवश्यकता होती है और ऊर्जा के लिये ईंधन की। भोजन ईंधन का काम करता है। शरीर रूपी मशीन में हुई टूट-फूट की मरम्मत के लिए भी भोजन की आवश्यकता होती है। मानव जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकतायें रोटी, कपड़ा और मकान होते हैं। बिना भोजन के कोई भी जीव लम्बे काल तक जीवित नहीं रह सकता। हमें क्या और कितना खाना चाहिए, यह जानना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है, क्योंकि अधिकांश बीमारियां गलत आहार के कारण उत्पन्न होती हैं।
प्रश्न: भोजन के मुख्य घटक क्या होते हैं और उनकी क्या महत्ता है ?
उत्तर: भोजन के निम्न घटक होते हैं:-
  1. कार्बोहाइड्रेट - ऊर्जा का मुख्य स्रोत।
  2. प्रोटीन - शरीर की कोशिकाओं के निर्माण में सहायक।
  3. वसा - शरीर की कोशिकाओं के निर्माण में सहायक, हार्मोन का निर्माण एवं संचित ऊर्जा का स्रोत
  4. विटामिन, खनिज, लवण - शरीर के विभिन्न रसायनिक एवं शारीरिक क्रियाओं में सहायक।

प्रश्न: कैलोरी क्या होती है?
उत्तर: कैलोरी ऊर्जा का माप है। हम शारीरिक श्रम में जो ऊर्जा खर्च करते हैं या भोजन से जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं उसे कैलोरी कहते हैं।
प्रश्न: किसी व्यक्ति को कितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, इसका निर्धारण कैसे करते हैं?

उत्तर: सबसे पहले यह ज्ञात करते हैं कि उस व्यक्ति का आदर्श वजन कितना होना चाहिए।
आदर्श वजन:
पुरूष: कद (सेमी. में) - 105 = वजन किग्रा. में
स्त्री : कद (सेमी. में) - 107 = वजन किग्रा. में
उदाहरण के लिए किसी पुरूष का कद 170 सेमी. है तो उसका आदर्श भार=170-105=65 किग्रा. होना चाहिए। इसके पश्चात् शरीर के लिये मूलभूत (Basic) ऊर्जा की आवश्यकता निकालते हैं। अब यदि व्यक्ति शिथिल जीवन शैली जीता है तो मूलभूत आवश्यकता का एक बटे तीन, यदि औसत जीवन शैली जीता है तो एक बटे दो और यदि अत्यधिक श्रम करता है तो उतनी ऊर्जा और उसमें जोड़ देते हैं।
उदाहरण के लिए व्यक्ति का जीवन 70 किलो है तो:-
उसकी मूलभूत आवश्यकता 70 x 22 = 1540 कैलोरी
शिथिल जीवन शैली 1540 + (1540/3) = 2055 कैलोरी
साधारण जीवन शैली 1540 + (1540/2) = 2310 कैलोरी
अत्यधिक श्रमयुक्त जीवन शैली 1540 + 1540 = 3080 कैलोरी
यदि व्यक्ति आदर्श भार से अधिक वजन का है तो उसे उपरोक्त विधि से निकाली गई ऊर्जा से कम ऊर्जा का भोजन देते हैं, ताकि शरीर में संचित ऊर्जा खर्च की जा सके।

प्रश्न: भोजन में कैलोरी की मात्रा का निर्धारण होने के पश्चात् विभिन्न घटकों से कितनी ऊर्जा ली जाये, इसका क्या अनुपात होना चाहिए?

उत्तर: भोजन में ऊर्जा के साथ-साथ विभिन्न घटकों के अनुपात को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। भोजन में 60-65 प्रतिशत ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट, 15-20 प्रतिशत प्रोटीन एवं 15-20 प्रतिशत वसा से प्राप्त होनी चाहिए। भोजन में रेशे की मात्रा समुचित होनी चाहिए, इस के लिए चोकर युक्त आटा, हरी सब्जी, सलाद एवं सम्पूर्ण फल का सेवन करना चाहिए।

विश्व मधुमेह दिवस 14 नवम्बर

विश्व मधुमेह दिवस 14 नवम्बर
निरन्तर मधुमेह रोगियों की संख्या में हो रही वृद्धि को देखते हुए 1991 में इण्टरनेशनल डायबिटीज फेडेरेशन एवं “विश्व स्वास्थ्य संगठन” ने संयुक्त रूप से इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने हेतु प्रति वर्ष “विश्व मधुमेह दिवस” आयोजित करने का विचार किया। इस हेतु उन्होने 14 नवम्बर का दिन चयनित किया। आप पूछ सकते हैं कि 14 नवम्बर ही क्यों?

मधुमेह रोग के कारण एवं इसके विभिन्न पहलुओं को समझने हेतु कई लोग प्रयासरत थे। इनमें से एक जोड़ी फ्रेडरिक बैटिंग एवं चार्ल्स बेस्ट की भी थी, जो पैनक्रियाज ग्रन्थि द्वारा स्रावित तत्व के रसायनिक संरचना की खोज में लगे हुए थे। इस तत्व को अलग कर उन्होंने अक्टूबर 1921 में प्रदर्शित किया कि यह शरीर में ग्लूकोज निस्तारण करने में अहम् भूमिका निभाता है और इसकी कमी होने से मधुमेह रोग हो जाता है। इस तत्व को “इंसुलिन” का नाम दिया गया। इसकी खोज मधुमेह के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस कार्य हेतु इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
14 नवम्बर फ्रेडिरिक बैटिंग का जन्म दिवस है। अतः “विश्व मधुमेह दिवस” हेतु इस तिथि का चयन किया गया। प्रारम्भ में “विश्व मधुमेह दिवस” हेतु “यिन और याँग” को प्रतीक चिन्ह के लिये चुना गया था। चीनी संस्कृति में “यिन और याँग” को द्वैतवात के अनुसार प्रकृति में संतुलन का प्रतीक माना जाता है। यह पहचान चिन्ह इस बात की ओर इंगित करता है कि इस बीमारी पर समुचित लगाम कसने हेतु रोगी, चिकित्सक, सामाजिक जागरूकता आदि विभिन्न तत्वों के बीच संतुलन होना आवश्यक है।
“इण्टरनेशनल डायबिटीज फेडेरेशन” के सतत् प्रयास के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने अन्ततः मधुमेह की चुनौती को स्वीकारा और दिसम्बर 2006 में इसे अपने स्वास्थ कार्यक्रमों की सूची में शामिल किया। सन् 2007 से अब यह संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सूची में शामिल होने का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अब संयुक्त राष्ट संघ के सदस्य देश अपनी स्वास्थ संबंधी नीति-निर्धारण में इसे महत्व दे रहें हैं।
सन् 2007 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस दिवस को अंगीकार करने के बाद इस का प्रतीक चिन्ह “नीला छल्ला” चुना गया है। छल्ला या वृत्त, निरंतरता का प्रतीक है। वृत्त इस बात का प्रतीक है विश्व के सभी जन इस पर काबू पाने के लिये एकजुट हो। नीला रंग आकाश, सहयोग और व्यापकता का प्रतीक है। इस प्रतीक चिन्ह के साथ जो सूत्र वाक्य दिया गया है वह है। Unite for Diabetes मधुमेह के लिए एकजुटता।
प्रत्येक वर्ष, “विश्व-मधुमेह दिवस” किसी एक केन्द्रीय विचार पर बल देता है। वर्ष 2008 का विचार “Diabetes and Children” “मधुमेह एवं बच्चे” था। बच्चों में मधुमेह टाइप - 1 एवं टाइप - 2 दोनो प्रकार के हो सकते है।
बच्चों में मुख्यतः टाइप - 1 मधुमेह होता है, जिसके चिकित्सा के लिए जीवन पर्यन्त इंसुलिन लेना होता है। कई बार इससे पीड़ित बच्चें के लक्षणों को न पहचान पाने के कारण उनकी मौत, डायाबिटीक कोमा में हो जाती है। बिमारी के निदान होने के बाद भी आर्थिक और अन्य कारणों से इन बच्चों को समुचित चिकित्सा नहीं मिल पाती। बदलते जीवन शैली और ठोस, उच्च उर्जा युक्त भोजन की प्रचुरता के कारण बच्चों में मोटापे की प्रवृत्ति इधर बहुत तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी आंकड़े बताते हैं कि 7-15 वर्ष की आयु वर्ग के बीच मोटापे की दर में 1985 से 1997 के बीच दो से चार गुनी वृद्धि हुई है। भारत में तमिलनाडु में डा. रामचन्द्रन द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण में 13-18 वर्ष के बच्चो में 18% में मोटापा पाया गया। बच्चों में बढ़ते मोटापे की प्रवृति एवं शारीरिक श्रम में कमी के कारण अब टाइप-2 मधुमेही बच्चे भी बड़ी संख्या में देखने को मिल रहें हैं। इन्ही बातों को संज्ञान में लेते हुए वर्ष 2008 विश्व मधुमेह दिवस का केन्द्रीय विचार “Diabetes and Children” “बच्चे और मधुमेह” दिया गया । वर्ष 2008-09 में डायबिटीज सेल्फ केयर क्लब ने बच्चों को केन्द्रित कर वर्ष भर के लिये एक अभियान शुरू किया था जिसका नाम “मधुमेह विजय” दिया गया। इस अभियान के तहत प्रति माह विभिन्न स्कूलों में बच्चों एवं अध्यापको को इस बिमारी के प्रति जागरूक करने, स्वस्थ भोजन, जीवन शैली एवं व्यायाम की महत्ता समझाने के लिये व्याख्यान किये गये और पोस्टर एवं स्लोगन प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों के सृजनात्मक सोच को विकसित किया गया।

किसी भी दीर्धकालिक व्याधि के साथ सफलतापूर्वक स्वस्थ जीवन जीने के लिये उचित चिकित्सा

मिशन एवं उद्देश्य
किसी भी दीर्धकालिक व्याधि के साथ सफलतापूर्वक स्वस्थ जीवन जीने के लिये उचित चिकित्सा के साथ उस व्याधि के बारे में सम्पूर्ण जानकारी परम् आवश्यक है। प्रिय मधुमेही बन्धुओं मधुमेह विषय पर इन्टरनेट पर विभिन्न वेब-साइट उपलब्ध है परन्तु हिन्दी में यह पहला वेब-साइट आपकी सुविधा एवं ज्ञान - वर्धन के लिये लाँच किया गया है। डा0 आलोक कुमार गुप्ता, चिकित्सक डायबिटीज एजुकेशन एवं रिसर्च सेंन्टर एवं चिकित्सीय सलाहकार ‘डायबिटीज सेल्फकेयर क्लब’ के द्वारा आप सभी का अभिवादन एवं इस वेबसाइट पर स्वागत है।

बन्धुओं 1983 में बी0आर0डी0 मेडिकल कालेज गोरखपुर, उत्तर - प्रदेश, भारत से मेडिसिन में स्नातकोत्तर (एम0डी0) की डिग्री लेने के पश्चात मैंने निजी चिकित्सक के तौर पर कार्य करना शुरू किया। समय के साथ मैने महसूस किया मधुमेह रोगियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। आप सभी जानते एवं महसूस करते होंगे कि दवाओं के अतिरिक्त भोजन, व्यायाम, कौन से जाँच कब और क्यों करायें, कितने अन्तराल पर करायें आदि तमाम ऐसी बाते होती हैं जिनकी व्यापक जानकारी हर मधुमेही को होनी चाहिए। मैने पाया कि वर्षों से मधुमेही रोगी लोगों को इस बीमारी की मूलभूत जानकारी भी नहीं होती, यहाँ तक कि सामान्यतः उनका रक्त शर्करा कितना होना चाहिए इस की भी जानकारी नहीं होती। एक या दो रक्त शर्करा रिपोर्ट सामान्य आते ही अधिकांश लोग दवायें बन्द कर देते हैं और फिर वर्षों जाँच नही कराते।
पश्चिमी देशों में चिकित्सक का कार्य एक सुपरवाइजर की तरह होता है। वह चिकित्सीय प्लान बनाता है, दवाओं की मात्रा निर्धारित करता है और समय - समय पर उसकी समीक्षा कर उसमें आवश्यक परिवर्तन करता है। बाकी कार्यो तथा भोजन, व्यायाम, इंसुलिन कैसे ले एवं दिन - प्रतिदिन आने वाली समस्या के लिये ‘‘डायाबिटीज एजूकेटर’’ होते है। उनके साथ रोगी बैठ कर विस्तृत चर्चा करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सक से सम्पर्क करते है। भारतवर्ष में यह सभी कार्य चिकित्सक को ही करने पड़ते हैं। यदि एक रोगी से विस्तारपूर्वक यह सभी बाते बताई जाये तो एक घंटे का समय लगता है, और व्यहवारिक तौर पर यह संभव नहीं हो पाता, न रोगी न ही चिकित्सक इतना समय देने की स्थित में होते हैं।
इस समस्या के समाधान हेतु मैने अपने क्लीनिक पर माह में एक दिन ‘मधुमेह क्लीनिक’ करना शुरू किया। उस दिन तीन घंटे के ‘शिक्षा सत्र’ में सभी नये पंजीकृत रोगियों को मधुमेह की मूलभूत जानकारी दी जाती है। इसके काफी सकारात्मक परिणाम सामने आये। धीरे - धीरे मैने महसूस किया कि इस शिक्षा - अभियान का क्षेत्र और विस्तृत किया जाये। सन 2003 में कुछ उत्साही मधुमेह बन्धुओं के सहयोग से यह सपना भी साकार हुआ। दवा व्यवसायी श्री नीरज तिवारी, शामियाना व्यवसायी श्री कमल चैरसिया एवं श्री विनय श्रीवास्तव, वेदानन्द दूबे, धनश्याम प्रसाद श्रीवास्तव, डा0 विद्यावती के सक्रिय सहयोग से सन् 2003 में ‘डायाबिटीज सेल्फ केयर क्लब’ गोरखपुर की स्थापना हुई। अपनी स्थापना से निरन्तर यह क्लब हर माह के प्रथम रविवार को सतत् मधुमेह जनचेतना कार्यक्रम के अन्तर्गत व्याख्यान का आयोजन करता है, जिसमें विभिन्न विषयों यथा भोजन, व्यायाम, दवायें, नेत्र, गुर्दे, पैरो की देखभाल, कौन से जॉंच कब और क्यों करायें पर विशेषज्ञों का व्याख्यान कराया जाता है। 14 नवम्बर ‘विश्व मधुमेह दिवस’ पर विशेष व्याख्यान एवं ‘ग्लोबल डायबिटीज वाक’ का आयोजन किया जाता है। क्लब की गतिविधि को देखते हुए कालान्तर में फ्रीमेंसनरी संस्था लॉज वॉलैस - 99 एवं सहारा वेलफेयर फाउन्डेशन जैसी संस्था ने भी हाथ मिलाया हैं। मधुमेह के प्रति जागरूकता के लिये स्कूल, कालेज एवं विश्वविद्यालय में व्याख्यान एवं पोस्टर प्रतियोगिता का भी आयोजन पिछले वर्ष किया गया।
क्लब की गतिविधि की महत्ता एवं सफलता को देखते हुए ‘इंडिया टूडे’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने अपने 21 सितम्बर 2005 के हिन्दी अंश में इस पर लेख प्रकाशित किया है। उत्तर - प्रदेश डायविटीज एसोसियेसन ने 2007 में मेरे इस सामाजिक अभियान को देखते हुए फैलोशिप एवार्ड प्रदान किया।
इस जन-जागरूकता को और व्यापक स्वरूप देने हेतु इस वर्ष (2009) 14 नवम्बर को इस हिन्दी वेबसाईट को लॉंच किया जा रहा है। इस साइट का मुख्य उद्देश्य मधुमेह से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सरल एवं सुबोध तरीके से जानकारी देना है।
अभी इस वेबसाईट का शैशवकाल है। हमारा पूरा प्रयास होगा कि समय के साथ इसे और समृद्ध किया जाये। आप का सक्रिय सहयोग इस दिशा में उत्प्रेरक भी तरह कार्य करेगा। आशा है कि आप अपना अमूल्य सुझाव हमें निरन्तर भेजते रहेगें।

मधुमेह और सेक्स जीवन

मधुमेह और सेक्स जीवन
धुमेह (Blood Sugar) के रोगियों में सेक्स या जननेन्द्रिय सम्बन्धी समस्याओं की संभावना अधिक होती है। यह आश्चर्य का विषय है कि भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मधुमेह के रोगियों में सेक्स सम्बन्धी समस्याओं पर न तो मरीजों ने और न ही चिकित्सकों ने ही विशेष ध्यान देने की जरूरत महसूस की है। मधुमेह के रोगियों में पुरूषों की समस्याओं अलग होती है और महिलाओं की अलग।

  1. लिंग में पर्याप्त तनाव का आना (Erectile Dysfunction) सामान्य व्यक्तियों की तुलना में मधुमेह के रोगियों में यह समस्या से 15 साल पहले आने की संभावना होती है। सामान्य व्यक्तियों में यह समस्या 15 फीसदी की होती है, जबकि मधुमेह के रोगियों में यह समस्या 45 से 55 प्रतिशत होती है।
  2. लिंग में पर्याप्त तनाव न आने के मुख्यतः दो कारक होते हैं-एक स्नायु सम्बन्धी (Nerves Neuropathy), दूसरा रक्त नलिका सम्बन्धित।
  3. मधुमेह के रोगियों में आम व्यक्ति की तुलना में उच्च रक्तचाप की संभावना 30 फीसदी अधिक होती है। लिंग में पर्याप्त कड़ापन न आने की वजह उच्च रक्तचाप भी हो सकती है।
  4. कुछ दवाओं की वजह से भी लिंग में तनाव न आना (Erectile Dysfunction) हो सकती है।
  5. महिला मधुमेह रोगियों की योनि में सेक्स के दौरान चिकने पदार्थ का स्राव न होने के समस्या हो सकती है, जिससे सेक्स (Inter Course) के दौरान दर्द हो सकता है।

सेक्स सम्बन्धी सावधानियां:

  1. मधुमेह के रोगी अपने जननांगों की पर्याप्त सफाई रखें।
  2. शारीरिक संबंध बनाने से पहले खासकर महिलायें मूत्र त्याग जरूर कर लें।
  3. सेक्स के दौरान एक दूसरे का भरपूर सहयोग करें और प्रोत्साहन दें।
  4. ऐसी औषधियां न लें, जो इस पर प्रभाव डाल सकती हैं।
  5. रक्तचाप को नियंत्रण में रखें।
  6. शराब एवं तम्बाकू का सेवन न करें।
  7. अगर महिला मधुमेह रोगी को सेक्स के दौरान योनि में सूखापन की समस्या आ रही हो तो चिकित्सक से परामर्श कर विशेष क्रीम का प्रयोग कर सकती हैं।
  8. विशेष परिस्थितियों में लिंग का कलर डाप्लर अल्ट्रासाउण्ड करायें।

डा0 सुधीर कुमार
मधुमेह एवं हृदय रोग विशेषज्ञ

पेशाब अधिक मात्रा में होता है।

मधुमेह

अधिक मात्रा में पेशाब का होना मधुमेह का रोगी प्रतिदिन कई लीटर पेशाब बाहर निकालता है, जबकि सामान्य व्यक्ति में पेशाब की मात्रा प्रतिदिन लगभग डेढ़ लीटर होती है। मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति के सूखे होंठ यह दरसाते हैं कि वह बहुत अधिक प्यासा है। कुछ लोगों में पेशाब की मात्रा सामान्य से अधिक होती हैं, लेकिन उनके अन्दर शुगर नहीं होती। इसका एक कारण गुरदा फेलेयर भी हो सकता है। इस स्थिति में रात के समय पेशाब अधिक मात्रा में होता है। इस पेशाब का कम मात्रा में होने वाले पेशाब से मिलान करना चाहिए। यदि दोनों में अन्तर दिखायी पड़े, तो इनका परीक्षण करने के बाद ही रिपोर्ट के अनुसार इलाज कराना चाहिए। मधुमेह का पूरी तरह से इलाज न कराने पर इससे पीड़ित रोगी बेहोश भी हो सकता है। इस दशा से बचने के लिए रोगी को अपना ब्लड-शुगर टेस्ट कराते रहना चाहिए, जिससे बेहोशी की नौबत न आये। डाक्टरों का मानना है कि मधुमेह से पीड़ित रोगी की आँखों की रोशनी भी जा सकती है। मधुमेह के अनियन्त्रित होने पर उसका दुष्प्रभाव आँखों के रेटिना पर भी पड़ता है। अतः मधुमेह के लक्षण दिखायी देने पर ब्लड-शुगर टेस्ट जरूर कराना चाहिए, ताकि मोतियाबिन्द से बचा जा सके।
हाथ-पैरों में दर्द होना। ऑखों और मूत्रतन्त्र में संक्रमण होना। जॉघों और पसलियों में दर्द होना। चेहरे पर फालिज का प्रकोप । भोजन करते समय चेहरे पर अधिक पसीना आन। रात में सोते समय अचानक सॉस फूलन। खून में कमी, शरीर में सूजन, कब्ज़ की शिकायत और मूत्र की मात्रा का सामान्य से कम अथव। अधिक होना । लीवर के आकार में वृद्धि, अधिक दिनों तक पीलिया बीमारी का बने रहना, जोड़ों में दर्द और मुँह में बदबू तथा पायरिया के लक्षण। मधुमेह के लगभग चालीस प्रतिशत रोगियों में गुरदा-रोग पाया जाता है। यह किन परिस्थितियों में होता है, इसके बारे में नीचे बताया जा रहा है— c» यदि रोगी मधुमेह से काफी समय से ग्रस्त हो। - L» यदि रोगी के परिवार के लोग भी मधुमेहजनित J. - गुरदा–रोग से पीड़ित रहे हों। o/--> c» यदि मधुमेह का रोगी उच्च-रक्तचाप से भी ग्रसित - हो, तो उसमें गुरदा-रोग होने की सम्भावना होती है। @os c० मधुमेह रो पीड़ित चालीस बर्ष से कम उम्र के रोगियों Ay - में गुरदा-रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

Sunday, July 31, 2016

కిడ్నీ కేర్ మీ చేతుల్లో‌నే

కిడ్నీ కేర్ మీ చేతుల్లో‌నే


               మూత్రపిండాలు (కిడ్నీ) శరీరంలో రక్తాన్ని శుద్ధి చేస్తాయి. రసాయనాలు, ఇతర హానికర పదార్థాలు, ద్రవాలన్నీ ఈ వడపోత ప్రక్రియ ద్వారా బయటకు వెళ్లిపోతాయి. అంతటి ప్రాధాన్యం కలిగిన కిడ్నీలో సమస్య వచ్చిందంటే చాలు జీవితకాలం పూర్తయినట్టేనని చాలామంది భావిస్తారు. ఇది కేవలం ఒక అపోహ మాత్రమే. తగిన చికిత్సలు చేయించుకుంటే ఈ వ్యాధిగ్రస్తులు అందరిలాగే సంపూర్ణ జీవితాన్ని కొనసాగించవచ్చు. వయస్సు మీద పడిన తర్వాత వచ్చే ఈ సమస్యలను ఒక పద్ధతి లేని ఆహార నియమాల వల్ల యుక్త యస్సులో కొని తెచ్చుకుంటున్నారని వైద్యులు చెబుతున్నారు. అసలు మూత్రపిండాల వ్యాధులు ఏవిధంగా సోకుతాయి? ఎటువంటి జాగ్రత్తలు తీసుకోవాలి? వ్యాధి నుంచి ఎలా బయటపడాలి? ఆ క్రమంలో అందుబాటులోకి వచ్చిన నూతన చికిత్సలు ఏమిటి? అన్న విషయాలు ఈ వారం డాక్టర్స్‌ స్పెషల్‌లో తెలుసుకుందాం.
లక్షణాలు
కిడ్నీ వ్యాధి రావడానికి ముందుగా శరీరంలో కొన్ని ముఖ్యమైన సూచనలు కనిపిస్తాయి. వాటిని ప్రాతిపదికగా తీసుకుని వ్యాధి ఉన్నదీ లేనిదీ నిర్ధారణ చేసుకోవచ్చు. కాళ్లు, ముఖం వాపు, మూత్రవిసర్జన తగ్గడం, ఆకలి లేకపోవడం, ఉదయం నిద్ర లేచిన వెంటనే కడుపులో వికారంగా ఉండి వాంతి వచ్చినట్టుగా ఉండడం, పగటిపూటా ఇలాగే ఉండడంతోపాటు మగతగా ఉంటుంది. పగలు నిద్ర ఎక్కువగా రావడం, రాత్రిపూట నిద్ర పట్టకపోవడం కిడ్నీ వ్యాధి లక్షణాలు. ఇలా ఉన్నప్పుడు బ్లడ్‌ యూరియా క్రేట్‌ పరీక్ష చేయడం ద్వారా వ్యాధి ఉన్నదీ లేనిదీ తెలుసుకోవచ్చు. కిడ్నీ ద్వారా బయటకు వెళ్లవలసిన వ్యర్థ పదార్థాలు ఎక్కువ పరిమాణంలో ఉన్నాయా లేదా అన్నది ఈ పరీక్ష ద్వారా తేలిపోతుంది. ఒకవేళ వ్యర్థ పదార్థాలు ఎక్కువ పరిమాణంలో ఉన్నాయంటే దాన్ని కిడ్నీ వ్యాధిగా పరిగణించాలి. ఆ తర్వాత అల్ట్రాసౌండ్‌ స్కాన్‌, హిమోగ్లోబిన్‌ నివేదిక పరిశీలించి ఈ సమస్య దీర్ఘకాలంగా ఉందా లేక కొత్తగా వచ్చిందా అని తెలుసుకోవచ్చు. వ్యాధి ప్రాథమిక దశలో ఉంటే మందులతో నయం చేసుకోవచ్చు. మందులతో నయం కానప్పుడు దాని తీవ్రత పెరుగుతుంది. కొందరికి అధిక రక్తపోటు (హైబీపీ), మధుమేహం (డయాబెటిస్‌) దీర్ఘకాలికంగా ఉన్నప్పుడు వాటి ప్రభావం కిడ్నీలపై నెమ్మదిగా పడి వ్యాధి తీవ్రతరమవుతుంది.

రక్తశుద్ధి ఎప్పుడంటే...
ఈ వ్యాధికి సంబంధించిన లక్షణాలు ఉన్నాయా లేదా అని ముందుగా నిర్ధారించుకున్న తర్వాత చికిత్స మొదలవుతుంది. వ్యాధి ప్రాథమిక దశలో ఉంటే మందులు, ఆహార నియంత్రణ ద్వారా నివారించుకోవచ్చు. కాళ్లవాపు, ఆయాసం వంటి లక్షణాలు ఎక్కువగా ఉండి మందులు వాడుతున్నప్పటికీ మూత్ర పరిమాణం పెరగని పక్షంలో రక్తశుద్ధి (డయాలసిస్‌) చేయాల్సి వస్తుంది. ఆహార నియంత్రణతో శరీరంలో పొటాషియం పరిమాణం తగ్గని పక్షంలో అది గుండెపై ప్రభావం చూపుతుంది. మూత్రంలో యాసిడ్‌, యూరియా పరిమాణాలు పెరుగుతూ ఉంటే డయాలసిస్‌ తప్పనిసరిగా చేయాల్సి ఉంటుంది.
వ్యాధి ఎందుకొస్తుందంటే...
కిడ్నీ సమస్యలు రెండు రకాలుగా ఉంటాయి. ఒకటి తాత్కాలికమైనది కాగా రెండోది దీర్ఘకాలికంగా ఉండేది. తాత్కాలిక సమస్యకు అనవరసంగా పెయిన్‌ కిల్లర్స్‌ వాడడం, యాంటీ బయాటిక్‌లు అవసరమైనా, లేకపోయినా దీర్ఘకాలంగా తీసుకోవం, డీహైడ్రేషన్‌ వంటివి వచ్చినప్పుడు నిర్లక్ష్యం చేయడం లాంటి ప్రధాన కారణాల వల్ల కిడ్నీల్లో సమస్యలు ఏర్పడతాయి. ఇటువంటి వాటిని అరికట్టడం ద్వారా వాటిని ఆరోగ్యవంతంగా ఉంచుకునే వీలుంటుంది. మధుమేహం, హైపర్‌ టెన్షన్‌ వల్ల దీర్ఘకాలిక కిడ్నీ వ్యాధి ఏర్పడుతుంది. ఈ వ్యాధిగ్రస్తుల్లో అరవై నుంచి డభై శాతం మంది మధుమేహం కారణంగా సమస్యను ఎదుర్కొంటున్న వారే. మధుమేహ వ్యాధిని అదుపులో ఉంచుకోవడం వల్ల కిడ్నీ సమస్యలు రాకుండా నిరోధించకపోయినప్పటికీ కొంతవరకు జాప్యం చేయవచ్చు. ఒకవేళ వ్యాధి సోకినా డయాలసిస్‌ వరకు వెళ్లకుండా చేసుకునే అవకాశం ఉంటుంది.
ఇవీ జాగ్రత్తలు
కుటుంబంలో ఎవరికైనా మధుమేహ వ్యాధి ఉన్నా కుటుంబ సభ్యులంతా ఏడాదికి ఒకసారి రక్తపరీక్షలు చేయించుకోవాలి.
మధుమేహం, హైబీపీ ఉంటే వైద్యుల పర్యవేక్షణలో మందులు వాడడంతోపాటు ఆహార నియంత్రణ పాటించాలి.
మందులు క్రమం తప్పకుండా వేసుకుంటూ షుగర్‌ను అదుపులో ఉంచుకోవాలి.
తద్వారా కిడ్నీ సమస్యలనుు కొంతకాలం వాయిదా వేయవచ్చు.
షుగర్‌ను నియంత్రించుకోని పక్షంలో వృద్ధాప్యంలో రావాల్సిన కిడ్నీ సమస్యలు ముందుగానే వచ్చే అవకాశం ఉంటుంది.
క్యాలరీలు అధికంగా ఉండే పిజ్జాలు, బర్గర్లు వంటి వాటికి దూరంగా ఉండాలి.
ఆల్కహాల్‌, ధూమపానం వంటి అలవాట్లు మానేయాలి.
నిత్యం వ్యాయామం చేయడం, ఆహారం విషయంలో జాగ్రత్తలు పాటించడంతోపాటు రోజుకు రెండు లీటర్ల నీరు తాగడం ద్వారా కిడ్నీ సమస్యలు రాకుండా అరికట్టవచ్చును.
కిడ్నీ శరీరంలో మురుగును వదిలించే వ్యవస్థ వంటిది. ఆ మురుగు బయటకు పోకుండా లోపల ఉండిపోతే శరీరం మొత్తం పాడైపోతుంది. శరీరంలో రక్తాన్ని శుద్ధి చేయడం, సోడియం, పొటాషియం తదితర లవణాలను నియంత్రించడం మూత్రపిండాల విధి. అందువల్ల బీపీ, రక్తహీనత వంటివి ఉన్నప్పుడు కిడ్నీ పరీక్షలు చేయించుకోవడం ఉత్తమం.

రెండు విధాలుగా డయాలసిస్‌ 
కిడ్నీ వ్యాధి సోకిన రోగులకు ఒక్కోసారి డయాలసిస్‌ (రక్తశుద్ధి) అవసరమవుతుంది. ఇది రెండు రకాలుగా ఉంటుంది. ఒకటి హిమో డయాలసిస్‌, రెండోది పెరిటోనియల్‌ డయాలసిస్‌.
హిమో డయాలసిస్‌
ఇది చేయించుకునే రోగులకు బీపీ సాధారణ స్థాయిలో ఉండాలి.
వ్యాధి తీవ్రత ఎక్కువగా ఉన్న రోగుల్లో బీపీ తక్కువగా ఉంటుంది.
ఇటువంటి రోగులకు సీఆర్‌ఆర్‌టీ (కంటిన్యూయస్‌ రీనల్‌ రీప్లేస్‌మెంట్‌ థెరపి) అనే ఆధునిక యంత్రం ద్వారా డయాలసిస్‌ చేయవచ్చు.
ఈ చికిత్స దశల్లో కిడ్నీ విఫలమైతే దాని మార్పిడి విషయాన్ని రోగులకు చెప్పాల్సి ఉంటుంది.
పెరిటోనియల్‌ డయాలసిస్‌
పెరిటోనియల్‌ డయాలసిస్‌కు మరో పేరే హోం డయాలసిస్‌.
రోగులు హిమో డయాలసిస్‌ సెంటర్‌కు దూరంగా ఉన్న పక్షంలో
పెరిటోనియల్‌ డయాలసిస్‌ విధానాన్ని ఉపయోగిస్తారు.
ఈ విధానంలో యంత్రం అవసరం ఉండదు.
ఆస్పత్రికి వెళ్లాల్సిన అవసరమూ ఉండదు.
పచ్చకామెర్లు ఉన్న వారికి ఈ విధానం ఎంతో ఉపయోగకరంగా
ఉంటుంది.
దీనికి రక్తంతో సంబంధం ఉండదు.
హిమో డయాలసిస్‌లో బీపీ హెచ్చుతగ్గులు ఉండడం వల్ల రికవరీ
అవకాశాల్లో పది నుంచి ఇరవై శాతం వరకు రిస్క్‌ ఉంటుంది.
ఆరేడు గంటలకు ఒకసారి మూత్రంతో నిండిపోయిన బ్యాగ్‌ను
మారుస్తుండాలి.
ఇది నెమ్మదిగా పనిచేయడంతో బీపీలో హెచ్చుతగ్గులు వచ్చే అవకాశం లేదు.
హిమో డయాలసిస్‌ కంటే ఇది ఎంతో ఉపయోగకరమైనది.
- డాక్టర్‌ కె.ఎస్‌.నాయక్‌, 
నెఫ్రాలజిస్ట్‌, 
హైదరాబాద్‌.

మధుమేహానికి ప్రధాన కారణాలు

              నగరీకరణ, ఆహారంలో మార్పులు, జీవన ప్రమాణం పెరగడం, వ్యాయామం లేకపోవడం మధుమేహానికి ప్రధాన కారణాలుగా చెప్పవచ్చు. మధుమేహం ఇటీవల కాలంలో మన దేశంలో బాగా పెరిగినట్లు సర్వేలు వెల్లడిస్తున్నాయి. మన రాష్ట్రంలోనూ, దేశంలోనూ చాపకింద నీరులా మధుమేహం వ్యాప్తి చెందుతోంది. ప్రపంచానికే మధుమేహ రాజధానిగా మన దేశం నిలవబోతుందనడంలో నిజం లేకపోలేదు. సుమారు 50 మిలియన్లకుపైగా ఇప్పటికే మన దేశంలో మధుమేహం బారినపడ్డారని, ఈ సంఖ్య 2030 నాటికి 80 మిలియన్లకు పెరగవచ్చని ఆరోగ్య నిపుణుల అంచనా. నష్టం జరిగిన తరువాతగానీ దీని అసలు రూపం బయటపడదు. కాబట్టి దీనిని సైలెంట్‌ కిల్లర్‌ అంటారు. ఈ నెల 14న 'ప్రపంచ మధుమేహ దినోత్సవం' సందర్భంగా పాఠకుల అవగాహన కోసం ఈ వ్యాసం. మధుమేహం ఉందన్న సంగతి 50 శాతం మందికి పైగా వ్యాధిగ్రస్తులు గుర్తించ లేకపోతున్నారు. తెలుసుకున్న వాళ్లలో 50 శాతం మంది మాత్రమే తగిన వైద్యాన్ని తీసుకొంటున్నారు. మధుమేహం వలన నరాలు, గుండె, ఊపిరితిత్తులు, రక్తనాళాలు, మూత్రపిండాలు, కళ్లు, పాదాలు వంటి ఎన్నో అవయవాలు దెబ్బతింటాయి. కాబట్టి మధుమేహం గురించి అందరూ తప్పనిసరి తెలుసుకుని, దాని నుండి రక్షణ పొందాల్సిన అవసరం ఉంది. 
కారణాలు
కుటుంబంలో తల్లిదండ్రులకు మధుమేహం ఉన్నా, అధికబరువు, ఊబకాయం ఉన్నవారికి, ఎక్కువ శ్రమలేని జీవితాన్ని గడుపుతున్న వారికి, ఎక్కువ ఒత్తిడికి గురవుతున్న వారికి ఈ మధుమేహం వచ్చే అవకాశం ఉంది. కొలెస్ట్రాల్‌, ట్రైగ్లిజరైడ్‌ స్థాయి ఎక్కువగా ఉన్నవారు, నాలుగు కిలోల బరువున్న శిశువులకు జన్మనిచ్చిన స్త్రీలు, స్టెరాయిడ్స్‌ తీసుకునే వారికి రావచ్చు. తల్లిదండ్రులిద్దరికీ మధుమేహం ఉంటే 99 శాతం వారి పిల్లలకు వచ్చే అవకాశం ఉంటుంది. తల్లిదండ్రులలో ఒకరికి మధుమేహం ఉండి రెండోవాళ్ల బంధువుల్లో ఎవరికైనా మధుమేహం ఉంటే 75 శాతం వచ్చే అవకాశం ఉంది. బంధువులు ఎవరికైనా మధుమేహం ఉంటే 50 శాతం, తల్లిదండ్రులకు కాకుండా దగ్గర బంధువుల్లో ఎవరికైనా మధుమేహం ఉంటే 25 శాతం మందికి వస్తుందని వైద్యులు చెబుతున్నారు.
పరీక్షలు 
మధుమేహం నిర్ధారణకు సంబంధించి ఈ కింది పరీక్షలు తప్పనిసరిగా చేయించుకోవాలి. ఫాస్టింగ్‌, పోస్ట్‌ లంచ్‌ బ్లడ్‌ షుగర్‌ ప్రతి నెలా చేయించుకోవాలి. గ్లైకోజిలేటెడ్‌ హెమోగ్లోబిన్‌ (హెచ్‌బిఎ1సి) టెస్ట్‌లు రెండు మూడు నెలలకు ఒకసారి చేయించుకోవాలి. లిఫిడ్‌ ప్రొఫైల్‌ సంవత్సరానికి ఒకసారి, కిడ్నీ పరీక్షలు యూరియా, క్రియాటినైన్‌ ఆరు నెలలకు ఒకసారి, మెక్రో అల్బుమిన్‌ సంవత్సరానికి ఒకసారి, గుండె, లివర్‌, పాదాలను సంవత్సరానికి ఒకసారి పరీక్ష చేయించుకోవాలి. కన్ను రెటీనా గురించి పరీక్షలు సంవత్సరానికి ఒకసారి చేయించుకోవాలి. బ్లడ్‌ షుగర్‌ పరీక్షలతో పాటు ప్రతి సంవత్సరం కళ్లు, కిడ్నీలు, గుండె, కాలేయం, నరాలు, పాదాల పరీక్షలను చేయించుకుంటూ జాగ్రత్తలు తీసుకోవాలి. 
లక్షణాలు
తరచుగా మూత్ర విసర్జన చేయడం, అతిగా దాహం, ఆకలి వేయడం, బరువు తగ్గిపోవడం, చూపు మందగించడం, పుండ్లు త్వరగా మానకపోవడం, బాగా నీరసం, నిస్సత్తుగా ఉండటం, మర్మావయవాల వద్ద ఫంగల్‌ ఇన్‌ఫెక్షన్స్‌ రావడం వంటి లక్షణాలు ఉంటాయి.

ఆహార నియమాలు పాటించాలి

ఆహార నియమాలు పాటించాలి
పిజ్జా, బర్గర్‌, ఫైడ్‌రైస్‌, న్యూడిల్స్‌ వంటి ఫుడ్స్‌, నిల్వచేసిన ఆహార పదార్థాలు, వేపుళ్లు, మసాలా పుడ్స్‌ తినడం ద్వారా ఒబిసిటి థైరాయిడ్‌, సుగర్‌, అధికబరువు వంటి వ్యాధుల బారిన పడుతున్నారు. ఒక మనిషి రోజుకి 1600 నుంచి 1800 క్యాలరీలు ఆహార పదార్థాలుగా తీసుకోవాల్సి ఉంది. 2000 నుంచి 2,500 క్యాలరీలు తీసుకుంటున్నారు. 
శారీరక శ్రమ, వ్యాయామం చేయాలి
ప్రస్తుత సమాజంలో బిజిబిజీగా ఉండే ప్రజలు శారీరక శ్రమ, వ్యాయామం చేయడానికి విస్మరిస్తున్నారు. గతంలో పురుషులు, మహిళలు రోజుకు కొంత సమయాన్ని తోటల్లో మొక్కలు పెంపకం, ఇళ్లల్లో తేలికపాటి పనులు చేస్తూ శారీరకంగా శ్రమించేవారు. ప్రజల జీవనవిధానంలో మార్పులు, యాంత్రికరణతో శారీరక శ్రమ జోలికి పోవడం లేదు. ఆధునిక కాలంలో వ్యాయామం చేయడానికి సరిగ్గా సమయం దొరకడం లేదు. వ్యాధులబారిన పడకుండా ఉండాలంటే ప్రతి మనిషీ రోజుకు 30 నుంచి 40 నిమిషాల పాటు నడవాలి. ప్రజలు వారానికి ఐదురోజులు 45 నిమిషాలు పాటు నడవాలని వైద్యులు సూచిస్తున్నారు. 
మానసిక ఒత్తిడికి దూరంగా
ప్రజలు ఆరోగ్యంగా ఉండాలంటే మానసిక ఒత్తిడికి దూరంగా ఉండాలి. ఆధునిక కాలంలో మానసిక ఒత్తిడి వల్ల రక్తపోటు, మధుమేహం, గుండెపోటు, ఆయాసం, థైౖరాయిడ్‌ వంటి వ్యాధుల బారిన ప్రజలు పడుతున్నట్లు సర్వేలు స్పష్టం చేస్తున్నాయి. మానసిక ఒత్తిడిలకు దూరంగా ఉండాలంటే యోగా, మెడిటేషన్‌ చేయాలి. 
మధుమేహ వ్యాధిపై అవగాహన
ఆరోగ్య దినోత్సవం సందర్భంగా ఈ ఏడాది మధుమేహంపై అవగాహనకు పిలుపు నిచ్చారు. మధుమేహ వ్యాధి లక్షణాలు, వ్యాధి నిర్ధారణ, చికిత్సపై ప్రజల్లో విస్తృతంగా ప్రచారం కల్పించి తద్వారా ప్రజల్లో చైతన్యం తీసుకురావడం ద్వారా మధుమేహ వ్యాధిని నియంత్రించొచ్చు. మధుమేహ వ్యాధి భారం, దాని పరిణామాలు, వ్యాధి పరివీక్షణ, నివారణ మార్గాలు, మధుమేహ రోగులకు సమర్థ వంతమైన చికిత్సలపై ప్రభుత్వాలను సన్నద్ధులను చేయాలి.
శారీరక శ్రమ, వ్యాయామం తప్పనిసరి
ప్రస్తుతం కాలంలో ప్రజలు బిజిగా ఉంటున్నారు. వారి ఆరోగ్యాన్ని నిర్లక్ష్యం చేస్తున్నారు. శారీరక శ్రమ, వ్యాయామం చేయడం మానసిక ఒత్తిడుల నుంచి దూరంగా ఉండడం ద్వారా భావితరాలకు ఆరోగ్యాన్ని అందించొచ్చు. తల్లిదండ్రులు, పిల్లలు మధ్యంతరం రాకుండా ఉండాలంటే ప్రతి కుటుంబం రోజుకి గంటసేపు కుటుంబ సభ్యులతో గడపాలి. ప్రతి కుటుంబం ఒక మొక్కను నాటాలి. భావి తరాలు ఆరోగ్యంగా ఉంటే దేశం ఆరోగ్యంగా, ఆర్థికంగా అభివృద్ధి చెందుతుంది. 
డాక్టర్‌ మోకా ప్రసాదరావు, వైద్య నిపుణులు, రాజోలు

మధుమేహం.. నిర్లక్ష్యం చేస్తే ప్రాణానికే హానికరం

మధుమేహం.. నిర్లక్ష్యం చేస్తే ప్రాణానికే హానికరం

ప్రజాశక్తి - ఏలూరు అర్బన్‌
    'మీకు తెలుసా.. ఏటా ప్రపంచవ్యాప్తంగా 350 మిల్లియన్ల జనాభా మధుమేహ వ్యాధితో బాధపడుతున్నారు. 18 ఏళ్లు నిండిన వారిలో తొమ్మిది శాతం మంది ఈ వ్యాధి బారిన పడుతున్నారు. ఈ వ్యాధితో బాధపడేవారిలో 92 మిలియన్ల జనాభాతో చైనా ప్రథమ స్థానంలో ఉండగా, 62 మిలియన్ల బాధితులతో మన దేశం రెండో స్థానంలో ఉంది. 2030 నాటికి ఈ సంఖ్య మరింత రెట్టింపయ్యే అవకాశాలున్నట్లు ప్రపంచ ఆరోగ్య సంస్థ అంచనా వేయడం ఆందోళన కలిగిస్తోంది. ఇటీవల నిర్వహించిన ఓ సర్వేలో ఈ విషయాలు వెలయ్యాయి'. 
నేడు ప్రపంచాన్ని వణికిస్తున్న వ్యాధుల్లో మధుమేహం గురించి ప్రత్యేకంగా చెప్పనక్కర్లేదు. ఆహార అలవాట్లలో వస్తున్న మార్పులు, పనిఒత్తిడి, వారసత్వం ఇలా పలురకాల కారణాలు ఈ వ్యాధిబారిన పడేలా చేస్తోంది. ప్రపంచ ఆరోగ్యసంస్థ ఏటా ఈనెల ఏడో తేదీన ఆరోగ్యానికి సంబంధించి ఒక ముఖ్యమైన అంశంపై ప్రపంచ ఆరోగ్యదినోత్సవాన్ని నిర్వహిస్తోంది. దీని సందర్భంగా ప్రపంచవ్యాప్తంగా ప్రజలకు అవగాహన కల్పించేందుకు ప్రత్యేక కార్యక్రమాన్ని చేపడుతూ వస్తోంది. ఈ విధంగా 1950 నుంచి ప్రతిఏటా ఇలా కార్యక్రమాలను చేపడుతోంది. ఈ ఏడాది 'హాల్ట్‌ ది రైజ్‌ - బీట్‌ డయాబెటిస్‌' ( ఆరోగ్యకరమైన అలవాట్లు అలవర్చుకుందాం - మధుమేహ వ్యాధిని జయిద్దాం) అనే నినాదంతో అవగాహన కల్పించే కార్యక్రమం చేపట్టనుంది. ఈ సందర్భంగా మధుమేహ వ్యాధిపై ప్రజాశక్తి అందించే ప్రత్యేక కథనం
రక్తంలో గ్లూకోజ్‌ శాతం సాధారణం కన్నా ఎక్కువుగా ఉన్నా తక్కువుగా ఉన్నా దాన్ని మధుమేహం అంటారు. ఇందులో టైప్‌-1, టైప్‌-2 అని రెండు రకాలుగా చెబుతారు. టైప్‌-1 ప్రకారం ఇన్సులిన్‌ను ఉత్పత్తి చేసే కణాలు ప్రాంకియస్‌లో నాశనం అవ్వడం వల్లలో శరీరంలో చక్కెరపై నియంత్రణ కోల్పోతోంది. దీనిబారిన పడిన వారు జీవితకాలం ఇన్సులిన్‌ వినియోగించాలి. టైప్‌-2 జీవనశైలి, ఆహారపు అలవాట్లు వల్ల వస్తుంది. ఇన్సులిన్‌ ఉత్పత్తి అవుతున్నా నియంత్రణ చేసే సామర్థ్యం సరిపోకపోవడం వల్ల ఈ వ్యాధి బారిన పడతారు. దీనికి మందులను వినియోగించాలి. మధుమేహం గుండె, రక్తనాళాలు, కీళ్లు, కళ్లు, నాడీవ్యవస్థలపై ప్రభావం చూపుతోంది. మధుమేహ వ్యాధిగ్రస్తుల్లో దాదాపు 50శాతం మంది గుండె సంబంధిత వ్యాధులతో మృతిచెందుతున్నారు. అదేవిధంగా కిడ్నీలు పాడైపోవడం, చూపు మందగించడం, నరాల దెబ్బతినడం వంటి ఎన్నో రోగాల బారిన పడతారు. 
నియంత్రించండి ఇలా..
మన జీవనశైలిలో మార్పు చేసుకోవడంతో పాటుగా నిత్యం వ్యాయామం చేయడం, అధిక బరువును నియంత్రించుకోవడం, ఆరోగ్యకరమైన ఆహార అలవాట్లను అలవర్చుకోవడం వల్ల మధుమేహ వ్యాధిని దరిచేరకుండా చూడొచ్చని వైద్యులు చెబుతున్నారు. ఆహారంలో పండ్లు, కూరగాయలు, ఆకుకూరలు ఎక్కువుగా తీసుకోవడం వల్ల మధుమేహాన్ని అదుపులో ఉంచుకోవచ్చని సూచిస్తున్నారు. వీటికితోడుగా మద్యపానం, దూమపానం వంటి అలవాట్లాకు దూరంగా ఉండాలని చెబుతున్నారు. 
ప్రపంచ ఆరోగ్య సంస్థ మధుమేహ వ్యాధిపై ప్రపంచ ఆరోగ్య దినోత్సవం సందర్భంగా ప్రచారం చేయాలనుకున్నా ముందుగా ఆ వ్యాధికి కారణాలపై ప్రజలకు సరైన అవగాహన కల్పించాల్సి ఉంది. వ్యాధికి మూలాలను గుర్తించి దాన్ని నిర్మూలించే దిశగా చర్యలు చేపడితే దానికి తగిన ఫలితం ఉంటుందని పలువురు విశ్లేషకులు చెబుతున్నారు. ముఖ్యంగా కలుషిత ఆహారం, కాలుష్యం వంటి వాటి నివారణకు చర్యలు చేపట్టాలని వారు సూచిస్తున్నారు. దానికి తగినట్లుగానే అధికారులను కూడా అప్రమత్తం చేయాలని సూచిస్తున్నారు. 
వ్యాధులపై పూర్తిస్థాయి అవగాహన ముఖ్యం
రావి గోపాలకృష్ణయ్య, ప్రముఖ వైద్య సలహా నిపుణులు
వ్యాధుల నియం త్రణకు చర్యలు చేపట్టడే కాదు.. దానిపై ప్రజలకు పూర్తిస్థాయిలో అవగాహన కల్పించినప్పుడే వ్యాధులను నియంత్రించొచ్చు. ప్రభుత్వాసు పత్రుల్లో సేవలు మరింత మెరుగుపడాలి. నిరంతరం వైద్యులు అందుబాటులో ఉండాలి. గ్రామీణ ప్రాంతాల్లో ప్రజలకు ఆరోగ్య విషయాలపై అవగాహన కల్పించాలి. 
కాలుష్య నియంత్రణ అందరి బాధ్యత
ఎం.నాగార్జున, పర్యావరణ ఇంజినీరు,
కాలుష్య నియంత్రణ మండలి 
వాతావరణంలో కార్బ న్‌డై ఆక్సైడ్‌ ఎక్కువుగా కలవడం వల్ల ఓజోన్‌ పొర దెబ్బతింటోంది. దీనివల్ల ప్రజలు రకరకాల వ్యాధుల బారిన పడుతున్నారు. వాతావరణం కలుషితం కాకుండా చూడల్సిన బాధ్యత అందరిపైనా ఉంది. ఈ విషయాన్ని గుర్తించాలి.

మధుమేహం గురించి మ‌ద‌న‌ప‌డొద్దు‌..!

మధుమేహం గురించి మ‌ద‌న‌ప‌డొద్దు‌..!


                   మధుమేహం ఉందని తెలియగానే దిగులుపడతాం. ఆ దిగులు, ఆందోళన, టెన్షన్లే ఈ వ్యాధిని మరింత పెంచుతాయి కానీ, తగ్గించవు. ఈ వ్యాధి గురించిన పూర్తి చికిత్సా విధానం తెలియకపోవడం వల్లే ఇలా ఆందోళనపడటం సహజం. అది గ్రహించిన వి.జి.ఆర్‌ డయాబెటిస్‌ స్పెషాలిటీస్‌ హాస్పిటల్‌ డాక్టర్‌ కె. వేణు గోపాల్‌రెడ్డి గత కొద్ది సంవత్సరాలుగా ఈ వ్యాధితో బాధపడే వారికోసం, వారంతా ఆరోగ్యంగా జీవించడం కోసం కొన్ని అవగాహనా కార్యక్రమాలను రూపొందించారు.
షుగర్‌ను ఎలా సమర్థవంతంగా నియంత్రించాలి? ఇది ప్రాణాంతకమవకుండా ఏం చేయాలి? షుగర్‌వల్ల దెబ్బతినే అవయవాలను ఎలా కాపాడుకోవాలి? అందుకు ఎటువంటి జాగ్రత్తలు పాటించాలి? ఆహార నియమాలు ఎలా ఉండాలనే అతి ముఖ్యమైన విషయాలు తెలియజెప్పారు. ఆ వివరాలు 'జీవన' పాఠకులకు ప్రత్యేకం.
మధుమేహ వ్యాధి ఇటీవల మన దేశంలో బాగా పెరిగినట్లు సర్వేలు వెల్లడిస్తున్నాయి. అంతేకాకుండా మనదేశంలో ఆంధ్రప్రదేశ్‌ అగ్రగామిగా ఉందని, హైదరాబాద్‌ మధుమేహ నగరంగా ముందుందుని సర్వే తెలుపుతోంది. చాపకింద నీరులా మధుమేహం వ్యాప్తి చెందుతోంది. ప్రపంచానికే మధుమేహ రాజధానిగా మనదేశం ప్రసిద్ధికెక్కింది. సుమారుగా 50 మిలియన్లకి పైగా ఇప్పటికే మధుమేహం బారిన పడ్డారు. ఈ సంఖ్య 2030 నాటికి 80 మిలియన్లకి పెరగవచ్చని ఒక అంచనా.
దురదృష్టం కొద్దీ మధుమేహ వ్యాధి లక్షణాలు అంతగా ఇబ్బంది పెట్టేవి కాదు. అందుకే దానిని అంతగా పట్టించుకోం. నష్టం జరిగిన తరువాతగానీ అసలు వాస్తవం బయటపడదు. కాబట్టే దీనిని 'సైలెంట్‌ కిల్లర్‌' అంటారు.
మధుమేహం ఉందనేది, ఉన్నవాళ్లకు 50 శాతం మందికి తెలియనే తెలియదు. తెలుసుకున్న వాళ్లలో 50 శాతం మంది మాత్రమే తగిన వైద్యాన్ని తీసుకుంటున్నారు. మధుమేహం వల్ల నరాలు, గుండె, ఊపిరితిత్తులు, రక్తనాళాలు, మూత్ర పిండాలు, కళ్లు, పాదాల్లాంటి ఎన్నో అవయవాలు దెబ్బతింటాయి. కాబట్టి మధుమేహం గురించి అందరూ తప్పక తెలుసుకొని, దాని నుంచి రక్షణ పొందాలి.
రావడానికి ఎవరికి అవకాశం ఉంది?
కుటుంబంలో తల్లిదండ్రులకు ముధుమేహం ఉంటే
అధిక బరువు, ఊబకాయం ఉన్నవాళ్లు
ఎక్కువ శ్రమలేని జీవితాన్ని గడుపుతున్న వాళ్లు
ఎక్కువ ఒత్తిడికి గురవుతున్న వాళ్లు
కొలెస్ట్రాల్‌ (లేక) ట్రైగ్లిజరైడ్‌ స్థాయి ఎక్కువగా ఉన్నవాళ్లు
నాలుగు కిలోల బరువున్న శిశువుకు జన్మనిచ్చిన స్త్రీ
స్టెరాయిడ్‌ మందులు తీసుకునేవాళ్లకు
రిస్క్‌ ఎలా ఉంటుంది?
తల్లిదండ్రులిద్దరికీ మధుమేహం ఉంటే-99%
తల్లిదండ్రులో ఒకరికి మధుమేహం ఉండి రెండోవాళ్ల
బంధువులెవరికైనా మధుమేహం ఉంటే -75%
బంధువులెవరికైనా మధుమేహం ఉంటే - 50%
తల్లిదండ్రులకుగాక దగ్గర బంధువులకెవరికైనా
మధుమేహం ఉంటే -25%
చేయించుకోవలసిన పరీక్షలు
ఫాస్టింగ్‌, పోస్ట్‌లంచ్‌ బ్లడ్‌షుగర్‌ - నెలకోసారి
గ్లైకోజిలేటెడ్‌ హీమోగ్లోబిన్‌ - 2-3 నెలలకోసారి
లిఫిడ్‌ప్రొఫైల్‌ - సంవత్సరానికి ఒక్కసారి
కిడ్నీ పరీక్షలు - యూరియా, క్రియాటినైన్‌,
ఆరు నెలలకు ఒకసారి
మైక్రో ఆల్బుమిన్‌ - సంవత్సరానికి ఒక్కసారి
గుండె, లివర్‌, పాదాలను - సంవత్సరానికి ఒక్కసారి
కన్ను- రెటీనా గురించి - సంవత్సరానికి ఒక్కసారి
కేవలం బ్లడ్‌ షుగర్‌ పరీక్షలు చేయిస్తే చాలదు. ప్రతీ ఏడాది కళ్లు, కిడ్నీలు, గుండె, కాలేయం, నరాలు, పాదాలు పరీక్ష చేయించుకుంటూ జాగ్రత్తపడాలి.
ఒకటి మాత్రం అందరూ గుర్తుంచుకోవాలి మధుమేహం అదుపులో లేనివాళ్లలో ఈ అవయవాలు నిశబ్ధంగా దెబ్బతింటాయి. అది బయటపడేసరికి జరగాల్సిన నష్టం జరిగిపోతుంది.
వ్యాధి లక్షణాలు
తరచుగా మూత్ర విసర్జన చేయడం
అతిగా దాహం వేయడం
అతిగా ఆకలి వేయడం
బరువు తగ్గిపోవడం
చూపు మందగించడం
పుండ్లు త్వరగా మానకపోవటం
బాగా నీరసం, నిస్సత్తువ
మర్మావయవాల దగ్గర ఫంగల్‌ ఇన్ఫెక్షన్స్‌ రావడం
తెలుసుకోవడానికి
ఫాస్టింగ్‌ బ్లడ్‌ షుగర్‌ -126mg/dl ఉన్నా అంతకన్నా ఎక్కువగా ఉన్నా మధుమేహం ఉన్నట్లు గుర్తించాలి.
గ్లూకోజ్‌ టాలరెన్స్‌ టెస్ట్‌లో బ్లడ్‌షుగర్‌ 75mg  గ్లూకోజ్‌ తీసుకున్న రెండుగంటలకు 200mg/dl ఉన్నా, అంతకన్నా ఎక్కువగా ఉన్న మధుమేహం ఉన్నట్లు గుర్తించాలి.
అలాగే రాండమ్‌ బ్లడ్‌ షుగర్‌ 200mg/dl ఉన్నా, అంతకన్నా ఎక్కువగా ఉన్నా మధుమేహం ఉన్నట్లు గుర్తించాలి.
ఫాస్టింగ్‌ బ్లడ్‌షుగర్‌ 100`125 mg/dl మధ్య, ఆహారం తీసుకున్న తరువాత 140 mg/dl- 199 mg/dl ఉన్నవాళ్లని ప్రీ డయాబెటిక్‌ స్టేజీలో ఉన్నట్లుగా గుర్తించవచ్చు. వీళ్లకు భవిష్యత్‌లో షుగర్‌ వచ్చే అవకాశం చాలా ఎక్కువగా ఉంటుంది.
గుండెజబ్బులు
మధుమేహ వ్యాధిగ్రస్తుల్లో 50-60 శాతం మంది గుండె, రక్తనాళాలకు సంబంధించిన వ్యాధులతో భాదపడుతున్నట్లు పరీక్షలు తెలుపుతున్నాయి. టైప్‌-2 డయాబెటిస్‌తో బాధపడుతూ మరణించిన వాళ్లల్లో మూడు వంతులు గుండెనాళాలకు సంబంధించిన వ్యాధుల కారణాల వల్లే అని పరిశోధనల్లో తేలింది.
మూత్రపిండాలు
మధుమేహం ఎక్కువ కాలం అదుపులో లేకుండా ఉంటే ఆ ప్రభావం మూత్రపిండాల మీద పడవచ్చు. మూత్రపిండాలకు డయాబెటిక్‌ నెఫ్రోపతి వస్తుంది. ఇది వస్తే క్రమంగా మూత్రపిండాలు పాడైపోతాయి. మధుమేహాన్ని అదుపులో ఉంచుకోవడంతోనే డయాబెటిక్‌ నెఫ్రోపతిని అదుపులో ఉంచుకోవచ్చు.
పాదాలు
మధుమేహం వల్ల క్రమంగా రక్తనాళాలే కాదు, నరాలూ దెబ్బతింటాయి. ముఖ్యంగా శరీరం చివర ఉండే నరాలు దెబ్బతింటాయి. కాబట్టి మధుమేహమంటే పెరిఫెరల్‌ న్యూరోపతి వస్తుందని భయపడుతుంటారు. పాదాలలో, అరచేతుల్లో ఉన్న నరాలు, దెబ్బతినే ముందు తిమ్మిర్లు వస్తాయి. ఆ తర్వాత స్వర్మజ్ఞానం క్రమంగా తగ్గిపోతుంది. అలాంటప్పుడు పాదాలలో ఏమి గుచ్చుకున్నా తెలీదు.
కన్ను
మధుమేహం అదుపులో లేనివారిలో ముందుగా కన్ను వెనుకఃభాగంలో ఉండే రెటీనా అనే పొరలోని సూక్ష్మ రక్తనాళాలు దెబ్బతినటం జరుగుతుంది. దానివలన చివరకు అంధత్వం కూడా సంభవించవచ్చు.
చికిత్స
మధుమేహం వ్యాధి చికిత్సలో నాలుగు ముఖ్యమైన అంశాలను మనం తప్పకుండా పాటించాలి. అందులో
మొదటిది:
సరైన ఆహార నియమాలను పాటించడం.
రెండవది:
రెగ్యులర్‌గా వ్యాయమం చేయడం.
మూడవది:
క్రమం తప్పకుండా మందులు వేసుకోవడం.
నాల్గవది:
వ్యాధి గురించి పూర్తి అవగాహన కలిగి ఉండటం.
పైన చెప్పిన ఈ నాలుగు అంశాలను చక్కగా పాటించడం ద్వారా మనం మధుమేహం వ్యాధిని చక్కగా అదుపులో ఉంచుకోగలం. దీనివల్ల ఎక్కువకాలం ఆరోగ్యంగా జీవించడానికి వీలు కలుగుతుంది.

http://www.prajasakti.com/Content/1655505

దేశంలో తీవ్ర సమస్యగా మధుమేహం

                      మధుమేహం ప్రపం చాన్ని భయపెడుతోంది. అది అత్యంత వేగంగా పెరుగు తున్న దేశాల్లో భారతదేశం అగ్రస్థానంలో ఉంది. ప్రపంచ వ్యాప్తంగా అన్ని దేశాలలో పెరుగుతున్న ఈ సమస్య తీవ్రతను పరిగణనలోకి తీసు కొని ఈ ఏడాది మధుమేహాన్ని తరిమికొడదామని ప్రపంచ ఆరోగ్య సంస్థ (డబ్ల్యుహెచ్‌ఒ) పిలుపునిచ్చింది. ప్రపంచ వ్యాప్తంగా 35 కోట్ల మంది మధుమేహం బారిన పడ్డారు. మరో 20 సంవత్సరాలలో ఈ సంఖ్య రెట్టింప వుతుందని డబ్ల్యుహెచ్‌ఒ హెచ్చరిం చింది. 2012లో కోటిన్నరమంది కేవలం మధు మేహం వల్లే మరణించారు. ఇందులో 80 శాతం అల్ప, మధ్యా దాయం గల దేశాల్లోనే ఉంది. 1990 నుంచి 2013 వరకు ప్రపంచ వ్యాప్తంగా మధుమేహ వ్యాధిగ్రస్తుల సంఖ్య 45 శాతం పెరిగితే భారత్‌లో అది 123 శాతమని వాషింగ్టన్‌ విశ్వ విద్యాలయానికి చెందిన పరిశోధ కులు చేసిన ఓ అధ్యయనం తేల్చింది. స్థూలకాయం, నిద్ర లేమి, మూత్రపిండాల జబ్బు లు, పక్షవాతం, గుండెపోటు వంటి పలురకాల వ్యాధులకు కారణమయ్యే పది అంశాలలో మధుమేహం కూడా చేరింది. 1990లలో తొలి పది వ్యాధుల జాబితాలో లేని మధుమేహం 2013 నాటికి 8వ స్థానంలో నిలిచింది.
దేశంలో తీవ్ర సమస్యగా మధుమేహం
మన దేశం 'ప్రపంచ మధుమేహ రాజధాని 'గా మారిం ది. భారత్‌లో అకాల మరణాలకు చాలా వరకు మధుమేహం, రక్తపోటు లాంటి సాంక్రమికేతర వ్యాధులే కారణమవుతున్నా యని ప్రపంచబ్యాంకు విడుదల చేసిన నివేదికలో పేర్కొంది. 2011 అంచనాల ప్రకారం 20-79 సంవత్సరాల వయస్సు కలిగిన 6,13,00,000 మంది ప్రజల్లో మధుమేహం ఉంది. ఇది 2030 నాటికి 10,12,00,000 చేరుకుంటుందని అంచనా. మారుతున్న జీవనశైలిలో భోజనపు అలవాట్లు దీనికి కారణమౌతున్నాయి. వంశపారంపర్యం, జన్యు సంబం ధిత అంశాలు, వ్యాయామం లేకపోవటం, వయసు పైబడ టం లాంటి అంశాలు మధు మేహాన్ని వ్యాపింపజేస్తున్నాయి. 2001లో ఢిల్లీ, కోల్‌కతా, ముంబాయి, బెంగళూరు, చెన్నరు, హైదరాబాద్‌లలో 'నేషనల్‌ అర్బన్‌ డయాబెటిక్‌ సర్వే' జరి గింది. దీని ప్రకారం 2001లో దేశంలో మధుమేహ సగటు 12 శాతంగా ఉంది. ముంబాయి, ఢిల్లీలో 9 శాతం ఉంటే దక్షిణభారత దేశ నగరాలలో 13-15 శాతం ఉంది. అంతే కాక ఆరు మెట్రో నగరాలలో హైదరాబాద్‌లోనే ఇది ఎక్కువ. ఇక్కడ సగటు మధుమేహం 16 శాతం వుంది. ముఖ్యంగా పట్టణ పేదలలో ఈ వ్యాధి తీవ్రత ఎక్కువగా ఉంది. ప్రతి నలుగురు పట్టణ పేదలలో ఒకరికి మధుమేహం ఉంది.
రెెండు తెలుగు రాష్ట్రాల్లో...
రెెండు తెలుగు రాష్ట్రాల్లో మధుమేహం ప్రమాద ఘంటికలను మోగిస్తోంది. మన విద్యావ్యవస్థ కూడా రోగాలకు కారణమౌతోంది. పిల్లలు అందమైన బాల్యాన్ని, ఆటపాటలను పూర్తిగా కోల్పోతున్నారు. వాటి స్థానే ఎంతసేపూ చదువు, హోంవర్కులు, ట్యూషన్లు లేదా టీవీ, కంప్యూటర్లు చూడటంతోనే బాల్యం గడిచిపోతోంది. ఇక ఇంటర్మీడియెట్‌ విద్యావిధానం కట్టుబానిసత్వానికి ప్రతీక. తల్లిదండ్రులు ముఖ్యంగా రెండు తెలుగు రాష్ట్రాలలో ఈ విధానాన్ని సమర్థించి ఆచరిస్తున్నారు. ఈవిధానం విద్యా ర్థుల్లో అపరిమితమైన మానసిక ఒత్తిడి, అభద్రతాభావం, అనారోగ్యకరమైన పోటీతత్వం పెంపొందిస్తున్నాయి. ఒక వైపు పోషకాహారం అందక కోట్ల మంది బాలలు బక్కచిక్కి పోతున్న దేశంలోనే స్థూలకాయంతో అవస్థలు పడుతున్న వారి సంఖ్య పది శాతం దాటిపోయి మరింత వేగంగా పెరుగుతున్న తీరు భయాందోళనలను కలిగిస్తోంది.
యువతలో మధుమేహం
యువత మధుమేహం బారిన పడుతోంది. ఈ వయసులో మాకెందుకు వస్తుందిలే అని నిర్లక్ష్యం చేస్తున్నారు. నగరంలోని ప్రముఖ సుగర్‌ క్లినిక్స్‌కు చెందిన 34 శాఖల్లో 2015 నవంబరు నుంచి 2016 జనవరి వరకు నిర్వహించిన ర్యాండమ్‌ బ్లడ్‌ స్క్రీనింగ్‌ క్యాంపుల ద్యారా చేసిన అధ్యయ నంలో ముఖ్యంగా మధుమేహం బారిన పడిన యువత 22.78 శాతం ఉంది. ఈ సర్వేలో మొత్తం 37,075 మందికి పరీక్షలు చేశారు. అందులో 7,839 మందికి మధుమేహం ఉన్నట్టు నిర్థారణ అయ్యింది. వయస్సుల వారీగా నాలుగు వర్గాలుగా విభజించి ఈ అధ్యయనం చేశారు. 31-40 సంవత్సరాల వారిలో 22.78 శాతం, 41-50 మధ్య 21.16 శాతం, 51-60 మధ్య 22.97 శాతం, 60 పైబడినవారిలో 29.99 శాతం మందికి ఉంది. తీసుకొనే ఆహారంలో తీవ్రమైన మార్పులు రావడం, శారీరక శ్రమ బాగా తగ్గిపోవ డం వంటి కారణాలతో గ్రామీణ, నగర పంచాయతీ ప్రాంతా లలో స్థూలకాయం, మధుమేహం పెరుగుతోంది. సాఫ్ట్‌వేర్‌ లాంటి సంస్థల్లో, అవుట్‌సోర్సింగ్‌ పేరులో పనిచేసే ఉద్యో గులు రోజుకు 12 గంటలు పనిచేస్తూ యంత్రాలుగా తయారవుతున్నారు. విపరీతమైన ఒత్తిడితో మధుమేహాన్ని కొని తెచ్చుకుంటున్నారు. మధుమేహం వల్ల స్త్రీపురుషుల్లో చాలా తక్కువ వయస్సులోనే అనారోగ్య సమస్యలు తలెత్తుతున్నాయి. చాలా మంది యువతీయువకులు చిన్న వయస్సులోనే గుండె జబ్బులు, నాడీ జబ్బులు,కీళ్ళ నొప్పులను ఎదుర్కోవడానికి కూడా ఇదే కారణమని చెప్పవచ్చు.
భారతీయుల్లోనే ఎక్కువ
ఆసియా దేశవాసులు ముఖ్యంగా భారతీయుల శరీరాకృతిని పాశ్చాత్య దేశాల ఆకృతితో పోలిస్తే భిన్నంగా ఉంటుంది. అమెరికన్లు, యూరోపియన్లు బరువు పెరిగిన ప్పుడు కొవ్వు శరీరమంతా ఒకే విధంగా విస్తరిన్తుంది. దీన్ని జనరలైజ్డ్‌ ఒబెసిటి అంటారు. ఆసియన్లలో ముఖ్యంగా భారతీయుల్లో కొవ్వు పొట్ట, నడుం భాగంలోనే పెరుగు తుంది. దీన్ని సెంట్రలైజ్డ్‌ ఒబెసిటి అంటారు. దీంతో ఇన్సులిన్‌ రెసిస్టెన్స్‌ ఇంకా ఎక్కువౌతుంది. జనరలైజ్డ్‌ ఒబెసిటీ కంటే సెంట్రలైజ్డ్‌ ఒబెసిటి మరింత ప్రమాదం. అంతేకాక మన దేశస్తుల్లో మధుమేహానికి కారణమయ్యే జన్యువులు కూడా ఎక్కువే ఉన్నట్టు అధ్యయనాలు తెలియజేస్తున్నాయి.
ప్రపంచ దేశాల అప్రమత్తత
సాంక్రమికేతర వ్యాధులు ముఖ్యంగా మధుమేహం, రక్తపోటు, గుండెజబ్బులు, కేన్సర్‌ లాంటి వ్యాధులు మానవాళి మనుగడను ప్రమాదంలో పడేస్తున్న వాస్తవం అవగతం కాగానే ప్రపంచ దేశాలు అప్రమత్తమయ్యాయి. 2003 మేలో జరిగిన ప్రపంచ ఆరోగ్య సదస్సు ఈ వ్యాధుల కట్టడికి కార్యాచరణ రూపొందించింది. జాతీయ స్థాయి నుంచి ప్రపం చ స్థాయి దాకా భాగస్వామ్యం ఏర్పరచాలని, సమగ్ర నివారణ చర్యల దిశగా ముందడుగు వేయాలని అది నిర్ణయించింది. ఆరోగ్యకరమైన జీవనశైలి, సాంక్రమికేతర వ్యాధుల నియం త్రణపై 2011 ఏప్రిల్‌లో మాస్కోలో జరిగిన మొట్టమొదటి ప్రపంచ మంత్రిత్వశాఖల స్థాయి సదస్సు అనారోగ్య ఆహార అలవాట్లను, సోమరితనాన్ని, హానికర ఆల్కహాలు వినియోగాన్ని నిరోధించాలని పిలుపునిచ్చింది. అదే ఏడాది సెప్టెంబరులో సమావేశమైన ఐక్యరాజ్యసమితి సర్వప్రతినిధి సభ సాంక్రమికేతర వ్యాధుల అదుపుకు అనువైన వాతా వరణం కల్పిస్తామని, అంతర్జాతీయ సహకారాన్ని పెంపొంది స్తామని అభయమిచ్చింది. ఈ బాటలో ఆస్ట్రేలియా, బ్రిటన్‌, బ్రెజిల్‌ లాంటి దేశాలు అనేక చర్యలు తీసుకోవడం వల్ల మధుమేహం, రక్తపోటు లాంటి సాంక్రమికేతర జబ్బుల్ని అరికట్టగలిగాయి.
నివారణే కీలకం
మధుమేహం లాంటి సాంక్రమికేతర వ్యాధులు ఒకసారి వచ్చాక నయమయ్యే పరిస్థితి ఉండదు.ఈ వ్యాధులు దీర్ఘకాలికమైనవి, ఖరీదైన చికిత్స అవసరమైనవి. ఇప్పటికే చాలామంది పేదలు మధుమేహాన్ని గుర్తించడంలోనూ, గుర్తించిన తర్వాత మందులు వాడటంలోనూ తీవ్ర ఇబ్బం దులను ఎదుర్కొంటున్నారు. దీని దృష్ట్యా ప్రభుత్వం నివారణా చర్యల మీదనే ఎక్కువ దృష్టి సారించాలి. ప్రజలందరూ ఆరోగ్యంగా ఉండాలంటే కొన్ని అంశాలకు ప్రభుత్వం బాధ్యత వహించాలి. మరి కొన్ని అంశాల బాధ్యత సమాజం తీసుకోవాలి. ఈ రెండింటితో పాటు ప్రజలు కూడా ఎవరికి వారు కొన్ని జాగ్రత్తలు తీసుకొని ఆరోగ్యాన్ని కాపాడు కోవాల్సిన అవసరం ఉంది. ఎప్పుడైతే వ్యాధి కారకం సామా జిక జీవనంలో ఇమిడిపోతుందో అప్పుడు ఆ సమస్య చికిత్స ద్వారా నయమయ్యే సాధారణ స్థాయిని దాటి ప్రజారోగ్య సమస్యగా పరిణమిస్తుంది. ఇటువంటి సమస్యలకు సామా జిక పరిష్కారం వెతుక్కోవాల్సిన అవసరం ఉంటుంది. భారత దేశంలో ఆరోగ్య పరిరక్షణకై చేసే ఖర్చులో 82 శాతం ప్రజల జేబుల్లోంచి ఖర్చవడం గమనార్హం. ప్రజారోగ్యంపై ప్రభుత్యం చేస్తున్న వ్యయం స్థూల జాతీయాదాయంలో 1.1 శాతం మాత్రమే. ఇది కనీసం 3 శాతంగా ఉండాల్సిన ఆవశ్యకత ఉంది. సమానత్వంతో కూడిన ప్రజారోగ్యవ్యవస్థ మన లక్ష్యం. దేశ ప్రజల ఆరోగ్య పరిరక్షణకై ప్రభుత్వం ఎక్కువ మొత్తంలో ఖర్చుచేసినప్పుడు అసమానతలు లేని అభివృద్ధి సాధ్యం. తద్వారా ఆరోగ్య సూచికలు మెరగవుతాయి. కేంద్ర, రాష్ట్ర ప్రభుత్వాలు ఈ విషయాలను పరిగణనలోకి తీసుకొని సమానత్వంతో కూడిన ఆరోగ్యాభివృద్ధి కోసం కృషిచేస్తాయని ఆశిద్దాం.
- డాక్టర్‌ రమాదేవి మీసరగండ
(వ్యాసకర్త జనవిజ్ఞానవేదిక ఆరోగ్య సబ్‌కమిటీ కన్వీనర్‌)
సెల్‌ : 9490300863