| आप बीती |
सन् 2000 माह अक्टूबर, दीपावली की पूर्व संध्या अर्थात् छोटी दीपावली, स्थान-असुरन, डॉ0 आलोक गुप्ता का क्लिनिक समय 6.15 बजे सायं दाहिने पैर की एड़ी में भयंकर घाव के साथ डॉक्टर आलोक गुप्ता को दिखाना एवं घाव का इतिहास जानने के पश्चात् डाक्टर के द्वारा रैन्डम ब्लड शुगर सुगर की जांच करने पर ब्लड शुगर का 317 निकलने पर सहसा विश्वास न करना एवं पुनः उसी समय दुबारा जांच कने पर (दूसरे ग्लूकोमीटर से) रीडिंग 307 आना एवं तब तक घोषित मधुमेह मरीज बनने का झटका लगना।
उपरोक्त सारी बातें जो मेरे साथ घटित हुईं उनका पूर्व इतिहास यह है कि मेरे पैर में करीब 15 दिन पहले हल्का दाने के आकार का घाव हुआ और घाव बढ़ता चला गया किसी ने मुझे इसे चर्म रोग विशेषज्ञ से दिखाने की सलाह दी और मैं गोरखपुर मेडिकल कालेज के एक वरिष्ठ चर्म रोग विशेषज्ञ की इलाज कराने लगा और उनके द्वारा तीव्र क्षमता के दो-दो एन्टीबायोटिक देने के बावजूद भी घाव बढ़ता ही गया। मेरे लिए डा आलोक कुुमार गुप्ता के क्लिनिक पर पहुँचना वरदान बन गया। मेरे इतने बढ़े ब्लड शुगर पर डा. गुप्ता ने कहा कि मुझे आपके शुगर के बढ़ने की चिन्ता नहीं है मुझे आपके पैर की चिन्ता है, जिससे आप हाथ धो सकते हैं। उन्होंने मुझे तुरन्त इन्सुलिन लेने की सलाह दी। दूसरे दिन से ही डा. गुप्ता की देख-रेख में मैंने इन्सुलिन लेना शुरू कर दिया और घाव तेजी से भरना शुरू हो गया और करीब 10-12 दिन बाद घाव पूरी तरह से ठीक हो गया।
मैं डा. आलोक गुप्ता का पूर्ण रूपेण शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने समय से मुझे इन्सुलिन का इन्जेक्शन देकर मेरे दाहिने पैर को बचा लिया। एक बात का भी मैं जिक्र करना चाहूँगा कि मैंने स्वयं अपने हाथों इन्जेक्शन लगाया और मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई। 15 दिन बात डा. गुप्ता ने खाना खाने के बाद का ब्लड शुगर लेवल सामान्य होने पर इन्सुलिन से हटाकर मझे खाने वाली गोलियों पर ला दिया और मैं प्रत्येक माह अपने शुगर की नियमित जांच कराता रहा और मेरा ब्लड शुगर लेवल सामान्य बना रहा। तीन-चार माह बाद मैंने गोलियों का सेवन भी पूर्णतः बन्द कर दिया और मैं प्रति माह अपने ब्लड शुगर की जांच कराता रहता हूँ और मेरा ब्लड शुगर लेवल सामान्य ही बना रहता है।
एक बात तो मैं बताना ही भूल गया कि मेरा ब्लड शुगर लेवल कैसे सामान्य बना हुआ है। मैं पेशे से यान्त्रिक कारखाना, पूर्वोत्तर रेलवे में कार्यरत हूँ। प्रतिदिन 4-5 किमी. पैदल चलता हूँ। खान-पान (कैलोरी के अनुसार) संयमित है। कभी-कभार महीने में एकाध पीस मिठाई भी खा लेता हूँ। मेरे जैसे अन्य कुछ मधुमेह रोगियों ने मिलकर यह डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब की संस्था जो बनाई है, का मूल उद्देश्य यह है कि प्रत्येक मधुमेह रोगी इस संस्था के माध्यम से जहां प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को विशिष्ट विशेषज्ञों द्वारा जो जानकारी प्राप्त करता है अन्य उन मधुमेह रोगियों को जो इस संस्था के सदस्य नहीं है को भी इसको लाभ देने की कृपा करें। इस संस्था का आजीवन शुल्क एक सौ रूपये मात्र है जो नाम मात्र का है।
अन्त में मैं एक मधुमेह रोगी के रूप में अने अनुभव के आधार पर इतना कहना चाहूँगा कि मधुमेह से डरने की आवश्यकता नहीं है, योग, व्यायाम, खान-पान, रहन-सहन एवं दवा के माध्यम से इससे मुकाबला करने की आवश्यकता है। नियमित जांच एवं समय-समय पर चिकित्सक के परामर्श का भी इस रोग को कन्ट्रोल करने में महत्वपूर्ण योगदान है।
विनय कुमार श्रीवास्तवसीनियर सेक्शन इंजीनियर एन.ई. रेलवे, गोरखपुर
गोरखपुर शहर में ‘डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब’ का गठन अपने आप में एक अनूठा एवं सराहनीय कृति है। गोरखपुर शहर स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सकों एवं दवा निर्माता कम्पनियों के लिये अत्यन्त उपजाऊ एवं लाभप्रद क्षेत्रों में गिना जाता है।
उपरोक्त यथार्थ के विरूद्ध मधुमेहियों के निस्वार्थ भाव से सेवा, उनके ज्ञानवर्धन, आर्थिक सहायता एवं सजगता के लिये, क्लब के पदाधिकारी, कलल चैरसिया, प्रदीप त्रिपाठी, वेदानन्द बधाई के पात्र हैं। डॉ. आलोक कुमार गुप्ता जी जो इस क्लब के मेरूदण्ड हैं वास्तव में सफल मधुमेह चिकित्सक के अलावा एक सच्चे समाज सेवक हैं।
मुझे पिछले बीस सालों से मधुमेह रोग हैं। मैं शारीरिक श्रम, चिन्ता मुक्त जीवन, दवाओं के सेवन, नियमित जांच के सहारे आज तक स्वस्थ हूँ। मैं जब भी डॉ. गुप्ता के दवाखाना पर जाता था, वे मधुमेह के बारे में विस्तृत जानकारी देते थे। प्रति सप्ताह शनिवार के दिन दोपहर में विशेष रूप से बुलाते थे। उस दिन साहित्य, वीडियो, छायाचित्रों आदि के माध्यम से विशेष जानकारी देते थे।
मधुमेह ऐसी बीमारी है, जिसमें डाक्टर से अधिक मरीज को सर्तक एवं शिक्षित होने की आवश्यकता है। शरीर आप का है। मधुमेह की जटिलताएं, धीरे अनियमित होने से बढ़ती जाती है। इसका प्रभाव, हृदय, किडनी, आंख, पैर पर विशेष रूप से पड़ता है। आप को सजग रहना होगा। प्रति 6 माह पर हृदय, किडनी, आंख, पैर आदि की जांच अवश्य करा लेनी चाहिए। अपने डाक्टर के सम्पर्क में बराबर रहना चाहिए।
मधुमेह के बारे में अज्ञात होने के कारण लोगों को अपने पैर कटवाने पड़ते हैं। हृदयाघात हो जाता है। किडनी फेल हो जाती है। आंखों की दृष्टि चली जाती है लेकिन आप सजग हैं, मधुमेह नियंत्रित रखते हैं, डाक्टर के बराबर सम्पर्क में हैं, व्यायाम करते हैं तो आरम्भिक अवस्था में इनका निदान दवाओं आदि से शत-प्रतिशत संभव है। आप सामान्य जीवन लम्बे समय तक जी सकते हैं।
डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को एक कार्यशाला का आयोजन नेपाल क्लब में आयोजित करता है। शहर एवं प्रान्त तथा इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का व्याखान होता है। मुफ्त शुगर चेकिंग तथा अन्य शिक्षाप्रद कार्यक्रम होते हैं। निःशुल्क जांच आयोजित होते हैं। मात्र 100/- रूपये के आजीवन सदस्यता शुल्क है। शहर के विभिन्न पैथालोजी केन्द्रों पर संस्था के सदस्यों हेतु पच्चीस प्रतिशत की छूट दी जाती है। विभिन्ना कंपनियों द्वारा ग्लूकोमीटर आदि यन्त्रों पर विशेष छूट प्रदान की जाती है। प्रतिवर्ष नवम्बर माह में वा£षक उत्सव मनाया जाता है।
क्लब में, योग, मनोरंजन सामाजिक सौहार्द पर विशेष ध्यान दिया जाता है। क्लब के सदस्य बड़े बेसब्री से माह के प्रथम रविवार का इन्ताजार करते हैं। यह नहीं प्रतीत होता कि हम किसी बिमारी के लिए किसी अस्पताल या डाक्टर के पास जाते हैं। लगता है अपने मिगो परिवार में मिलते एवं आनन्द के लिए जा रहे हैं।
हमारा जीवन बहुमूल्य है। इससे भी अधिक हमारी आने वाली संतानें, हमारे बच्चे अमूल्य हैं। मधुमेह का ज्ञान हमें, हमारे बच्चों को, हमारे समाज को, हमारे देश के भविष्य को बचा रहा है। इसमें ‘डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब’ गोरखपुर का भी आज एक छोटा पवित्र प्रयास है लेकिन हमें आशा है एक दिन यह पूरे प्रदेश एवं देश में अपना प्रमुख स्थान ग्रहण करेगा। हमें आशा है कि आप स्वयं उपरोक्त कथनों का परीक्षण स्वयं आकर करेंगे।
‘बागीश’
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Wednesday, August 17, 2016
आप बीती
मधुमेह एवं वृक्क रोग, मूत्र रोग एवं जननेन्द्रिय रोग
| मधुमेह एवं वृक्क रोग, मूत्र रोग एवं जननेन्द्रिय रोग |
मधुमेहः जब मानव शरीर में रक्त शर्करा नियमन की शक्ति न रहे उसे कहते हैं। अधिक रक्त शर्करा एवं नसों के प्रभावित होने से मूत्राशय मूत्रत्याग के बाद पूरी तरह से खाली नहीं होता है। परिणामतः बचे हुए मूत्र एवं मूत्र में शर्करा की मात्रा अधिक होने से मूत्राशय का इन्फेक्शन अधिक एवं बार-बार होता है। ऐसे रोगी द्वारा बार-बार मूत्र त्याग करना, मूत्र मार्ग में जलन एवं अपूर्ण मूत्र त्याग का अहसास होता है। रोग के अधिक बढ़ने पर मूत्र त्याग बिना संज्ञान के एवं स्वतः होने लगता है। ऐसा होने पर व्यक्ति यापन के स्तर एवं कार्य कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
अनियमित रक्त शर्करा जननेन्द्रियों के संक्रमण को आमंत्रित करती हैं मुख्यतः फंगस का संक्रामण। यह स्त्रियों को अधिक प्रभावित करता है। परिणामतः जननेन्द्रियों में जलन, खुजली एवं अनुचित स्राव होता है, जिससे जीवन यापन के स्तर एवं कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
मधुमेह कई वर्षों तक अनियत्रिंत रहने पर पुरूष जननेन्द्रियों पर नपुंसकता के रूप में विपरीत प्रभाव डालता है, जिससे वैवाहिक जीवन प्रभावित होता है। कुछ विपरीत प्रभाव नारी जननेंद्री पर भी पड़ता है जिस पर बहुधा ध्यान नहीं दिया जाता है।
मधुमेह, वृक्क अकार्यकुशलता का प्रमुख कारण है। दिन प्रतिदिन ऐसे रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। रोग के बढ़ने पर ऐसे रोगियों को डायलिसिस (रक्त शोधन) अथवा/एवं वृक्क प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है, जो अत्यधिक मंहगें एवं आम व्यक्ति की पहुँच से बाहर है। अतः इसका बचाव ही मुख्य मुद्दा होना चाहिए।
मधुमेह, उच्चरक्त चाप, रक्त में वसा की अधिक मात्रा एवं तम्बाकू का सेवन आपस में मिलकर वृक्क को अल्पायु कर देते हैं। साथ ही साथ रोगी भी अल्पायु हो जाता है।
मधुमेह जनित वृक्क रोग, रोगी की कार्यकुशलता, रोजगार तथा जीवन यापन के स्तर पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। रो बा आर्थिक पहलू रोगी एवं परिवार की वृद्धि एवं सम्पन्नाता को विपरीत प्रकार से प्रभावित करता है।
लम्बे समय का अनियंत्रित मधुमेह वृक्क की सूक्ष्म रक्त कोशिकाओं को बंद करता है तथा वृक्क की सूक्ष्म संरचना (ग्लोमेरूलस) नामक सूक्ष्म कार्य इकाई पर मैट्रिक्स नाम प्रोटीन का जमाव करता है। परिमाणतः ग्लोमेरूलस अधिक रक्त दबाव पर कार्य करते हैं। यहीं से वृक्क अकार्यकुशलता का प्रारम्भ होता है:-
मधुमेह के ऐसे रोगी सतर्क रहें:(क) आंख की रेटिना पर मधुमेह का प्रकोप हो (डायबेटिक रेटिनापैथी) (ख) मूत्र में प्रोटीन का रिसाव सूक्ष्म रिसाव 30-300 mg/day वृहद रिसाव 300 mg प्रतिदिन से अधिक (ग) रक्त चाप बढ़ने पर (घ) पांच वर्ष से अधिक का मधुमेह होने पर
ध्यान रहे वृक्क कार्यकुशलता को जानने के लिये कराये जाने वाली आम रक्त जांच (urea/creatinine) के बढ़ने से पहले ही मधुमेह वृक्क को प्रभावित कर देता है।
बचावःजो निम्न बिन्दुओं पर आधारित है। (क) रक्त शर्करा का नियमन (ख) रक्तचाप का नियमन <130 hg="" mm="" of="" p="">प्रोटीन रिसाव होने पर <100 hg="" mm="" of="" p="">(ग) जीवन शैली में बदलाव (घ) तम्बाकू का परहेज (ड.) औषधि विशेष का सेवन ACE Inhibitor A-II Receptor blocker (च) प्रोटीन का सेवन कम करें (प्रोटीन का रिसाव होने पर) 0.8 gm/kg/day डा0 अरविन्द त्रिवेदी सह आचार्य नेफ्रोलोजी बी.आर.डी मेडिकल कालेज-गोरखपुर100>130> |
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