Wednesday, August 17, 2016

मधुमेह - मनोवैज्ञानिक पहलू

मधुमेह - मनोवैज्ञानिक पहलू

कोई भी लम्बे समय तक चलने वाला रोग एक तनाव (Stress) के रूप में कार्य करता है। मधुमेह एक दीर्घकालिक रोग है अतः यह भी एक तनाव के रूप में रोगी के मनोविज्ञान को प्रभावित करता है। रोग ज्ञात होने के क्षण से लेकर आजीवन वह विभिन्न मनः स्थितियों से गुजरता है। आप सभी क्लब के सदस्य इस सत्य से भली भांति परिचित होंगे। मैं जो कुछ भी कहने जा रही हूँ, आप पायेंगे कि जैसे आप के विषय में ही बात की जा रही है।
रोग निदान पर प्रारम्भिक प्रतिक्रिया:

  1. अस्वीकृति (Denial)
  2. क्रोध (Anger)
  3. अपराध बोध (Guilt)
  4. नैराश्य (Depression)
  5. स्वीकारोक्ति (Acceptance)

प्रथम बार संज्ञान में आने पर रोगी की सामान्य प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है। नहीं, नहीं, मुझे यह रोग नहीं हो सकता, अवश्य ही रिपोर्ट बदल गयी होगी, यह पैथालोजी क्लिनिक विश्वसनीय नहीं है, इस प्रकार की प्रतिक्रिया आम है। अधिकांशतः व्यक्ति किसी दूसरे क्लिनिक से पुनः जांच कराता है। कई बार इस कडुए सत्य को स्वीकार करने में काफी वक्त लगता है। एक बार व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकारने के लिए जब बाध्य हो जाता है तो उसकी अगली प्रतिक्रिया क्रोध की होती है, और यह एक स्वस्थ और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, क्योंकि उसे अपने जीवन-शैली में आजीवन व्यापक परिवर्तन करने होते हैं। व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, बात-बात में झल्लाना, तुनक मिजाज हो जाना उसका स्वभाव बन जाता है।
हे भगवान! यह तूने किस बात का दण्ड दिया? ऐसे कौन से पाप कर्म मैंने किये थे कि यह रोग मुझे हो गया? मैं ही क्यों? इस प्रकार के प्रश्न मन में घुमड़ने लगते हैं। सभी मनुष्य कुछ न कुछ गलत कार्य अवश्य करते हैं। इन्हीं को सोचकर व्यक्ति के अन्दर अपराध-बोध घर करने लगता है कि अवश्य ही मेरे उन कर्मों का दण्ड मुझे मिला है।
अन्ततः व्यक्ति अवसाद या नैराश्य की अवस्था में आ जाता है। सामाजिक रूप से अपने को काट लेता है, हर वक्त सोचता रहता है। इन सारी स्थितियों से होते हुए व्यक्ति धीरे-धीरे इस बीमारी होने के सत्य को स्वीकारने लगता है। उसकी मुलाकात अन्य रोगियों से भी होती है, उसे लगता है कि वह अकेला ही पीड़ित नहीं है। यदि उसे उचित मार्ग दर्शन करने वाला चिकित्सक, सलाहकार या ऐसी संस्था जो इस कार्य में लगी हुई है का सहयोग प्राप्त हो जाता है तो वह शीघ्र ही इस निराशा की स्थिति से निकल कर इस चुनौती से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाता है।
इस पूरे चक्र में कभी-कभी एक वर्ष तक का समय लग जाता है। यह समय इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी के इस रोग के होने के पश्चात् कंट्रोल करने के उपाय आदि के बारे में उचित जानकारी कितनी जल्दी मिल जाती है।
टाइप-1 मधुमेह रोगी बच्चे इस मामले में अधिक मनोवैज्ञानिक लचीलापन रखते हैं। एक अध्ययन के अनुसार 36% बच्चों ने रोग निदान के 3 माह के भीतर मानसिक तनाव के लक्षणों का प्रदर्शन किया अधिकांश के साथ ‘‘सामंजस्य’’ की समस्या आई। बच्चों को इसे स्वीकार करने, अपने गतिशील बाल्य काल के साथ पटरी बैठाने एवं नियमित इन्सुलिन इन्जेक्शन लेने के बीच सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है। ऐसे में परिवारजन, स्कूल के अध्यापक एवं सहपाठियों का सहयोग एवं रवैया काफी अहमियत रखता है। जिस परिवार में कोई बच्चा मधुमेह रोगी हो जाता है, उस परिवार के सदस्यों में भी तनाव के लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, विशेष कर माँ-बाप में। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा, यदि लड़की है तो शादी का क्या होगा, भगवान ने मेरे बच्चे को ही यह रोग क्यों दिया आदि प्रश्न मन-मस्तिष्क को मथने लगते हैं। बच्चे के साथ माता-पिता को भी इसे स्वीकारने एवं सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है।
एक बार स्वीकारोक्ति हो जाने के बाद चिकित्सा की जाती है। बिना शारीरिक श्रम किये, जीवन- शैली में व्यापक बदलाव किये यदि यह रोग समाप्त हो जाये तो क्या कहने! बार-बार इस रोग के कारण के बताने एवं यह समझाने पर भी कि फिलहाल व्यक्ति किसी चमत्कार की आशा में रहता है। जैसे ही उसे कोई बताता है कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति इसका शर्तिया इलाज करता है, वह वहां भागा हुआ जाता है। यह भाग-दौड़ कई बार जीवन पर्यन्त बनी रहती है। कुछ लोग दो-चार बार धोखा खाकर संभल जाते हैं। किसी चिकित्सा पद्धति में इस रोग को समाप्त करने की औषधि नहीं है, और जीवन भर नियमित चिकित्सा में रहना होगा।
दूसरी मानसिकता जो इसके इलाज में बाधक होती है, वह है दवाओं का अंग्रेजी और देशी होना। रोगी भले ही आधी गोली पर नियंत्रित क्यों न हो, वह देशी के चक्कर में कितनी भी दवा खाना पसन्द करता है, और बार-बार अपनी चिकित्सा से छेड़छाड़ करता है। यदि खाने की दवाओं से रोग पर समुचित नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, और रोगी को इन्सुलिन लेने की सलाह दी गई, तब वह एक बार पुनः तनाव में आ जाता है। इन्सुलिन न लेना पड़े इसके लिए वह तमाम तरह के तर्क गढ़ लेता है। एक बार लगा लूँगा तो फिर केाई दवा काम नहीं करेगी, इन्सुलिन लेने से आयु घट जाती है, जिसने भी इन्सुलिन लिया शीघ्र ही मर गया, यह चरस है, एक बार लगा तो छूटता नहीं है, इत्यादि धारणायें आम हैं। कई बार चिकित्सक भी रोगी कहीं और न चला जाय इस डर से इन्सुलिन लगाने की सलाह देने से घबराते हैं। अधिकांश रोगी तब तक इन्सुलिन टालते रहते हैं जब तक कोई जटिलता सामने आ खड़ी नहीं होती और तब ‘‘मरता क्या न करता’’ वाली मनः स्थिति में इन्सुलिन लेते हैं, और एक बार थोड़ा स्वस्थ होने पर बिना चिकित्सीय सलाह से इन्सुलिन छोड़ देते हैं।
चूँकि यह दीर्घकालिक रोग है और पूरे शरीर को प्रभावित करता है अतः भविष्य में होने वाली जटिलताएं पुनः एक बार तनाव का कार्य करती हैं और व्यक्ति पहले बताए गये अवस्थाओं से गुजरने लगता है।
रोग के इस मनोवैज्ञानिक पहलू से निपटने के लिए योग्य मनोवैज्ञानिक सलाहकार की मदद मिलनी चाहिए जिसे ‘काउन्सलर’’ कहा जाता है। भारत में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की अवधारणा की सामाजिक स्वीकारोक्ति अभी नहीं हो पायी है, और यह सारे कार्य चिकित्सक को ही करने पड़ते हैं जो रोगियों की संख्या के कारण इसे सक्षम रूप से सम्पादित नहीं कर पाता। ऐसे में ‘‘डायबिटिज सेल्फ केयर क्लब’’ जैसी संस्था काफी सशक्त रूप से इस कमी को पूरा कर सकते हैं।
क्लब के वरिष्ठ सदस्य जो इस अवस्थाओं से गुजर चुके हैं नये रोगियों के लिए मनोवैज्ञानिक सलाहकार का कार्य कर सकते हैं, ताकि रोगी नैराश्य से निकल कर शीघ्र-अतिशीघ्र इस चुनौती का मुकाबला करने में सक्षम हो सके।
डा0 विद्यावती
रीडर, मनोविज्ञान विभाग
सेण्ट एण्ड्रयूज कालेज, गोरखपुर
न्यायिक सदस्य ‘किशोर न्याय बोर्ड’

मधुमेह -समस्या की प्रबलत

मधुमेह -समस्या की प्रबलता

दीर्घकालिक रोगों में जो समय के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को क्षति पहुचातें है, मधुमेह प्रमुख है। यह एैसा रोग है जिसका तात्कालिक प्रभाव अधिकांश रोगियों में देखने को नहीं मिलता, और लम्बे समय तक पीड़ित व्यक्ति को इस बात का आभास नही होता कि वह इससे ग्रसित है और किसी शारीरिक अंग-यथा गुर्दे, आँख, हृदय आदि के प्रभावित होने के फलस्वरूप होने वाले लक्षण आने के पश्चात ही इस रोग का संज्ञान हो पाता है। संक्रामक रोगों पर नियंत्रण के पश्चात मधुमेह एक वैश्विक महामारी के रूप में उभर कर सामने आया है, जो तत्काल क्षति पहुचाने के बजाय एक दीमक की तरह आने वाले समय में हमारे मनुष्य जगत को खोखला करने वाला है। इसमें भी टाइप - 2 मधुमेह रोगियों की संख्या में सर्वाधिक इजाफा होने वाला है जो 30 वर्ष से उपर की आयु के लोगो को अपने चपेट में लेता है। यद्यपि कि पिछले कुछ वर्षो से अब 30 वर्ष से कम आयु के लोगों में भी टाइप - 2 रोगी मिलने लगें है और समस्या की प्रबलता घटने के बजाये बढ़ती जा रही है और यह अत्यन्त चिन्ता का विषय है। यही आयु मनुष्य का सर्वाधिक क्रियाशील और विभिन्न सामाजिक पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाला काल होता है निश्चय ही यह न केवल व्यक्ति के अपने कार्यक्षमता को क्षति पहुंचायेगा, वरन सरकार और देश के बहुमूल्य स्वास्थ सेवाओं और आर्थिक संसाधनो को भी निचोड़ेगा। बेहतर होती चिकित्सीय सुविधाओं से लोगों की औसत आयु पिछले 40 वर्षो में 59 वर्ष से बढ़कर 64 वर्ष हो गई है। मधुमेह के सन्दर्भ में इसका अर्थ होगा मधुमेह जनित जटिलताओं से पीड़ित जनसंख्या में वृद्धि और अपेक्षित संसाधनों में तुलनात्मक कमी।

इण्टरनेशनल डायबीटीज फेडेरेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘डायबीटीज एटलस’ के तृतीय संस्करण के माध्यम से आइये देखते है कि इस समस्या की प्रबलता कितनी है यह सभी आकड़े 20 से 79 वर्ष के आयु के है। सन् 2007 के आंकड़े बताते है कि विश्व स्तर पर 24.6 करोड़ लोग (आबादी का 5.9%) मधुमेह से पीड़ित थे, जिनकी संख्या 2025 में बढ़ कर 38 करोड़ (आबादी का 7%) हो जायेगी। करीब करीब 55% की बढोत्तरी होगी।
सन् 1994 में अनुमान लगाया गया था कि 2010 में मधुमेह रोगियों की संख्या 23.9 करोड़ हो जायेगी जबकि 2007 में ही यह संख्या 24.6 करोड़ हो चुकी है, यानि कि हम तीन वर्ष पहले ही अनुमानित आंकड़े को पार कर चुके है, यह अत्यन्त चिन्तनीय है, भारत के सन्दर्भ में यदि हम देखें तो सन् 2007 में मधुमेह रोगियों की संख्या 4.65 करोड़ थी जो 2025 तक बढ़कर 8.83 करोड़ हो जायेगी। करीब-करीब 73% की बढ़ोत्तरी होगी। गौर तलब यह है कि जितने मधुमेह रोगी ज्ञात रूप में सामने होते हैं लगभग उतने ही लोग मधुमेह के कगार पर खड़े होते जिन्हे हम ‘प्री-डायबीटीज’ (Pre-Diabetes) की अवस्था कहते हैं। ‘‘प्री - डायबीटीक को हम आज की तारीख में मधुमेह के घोषित मानक के तत्काल पहले की अवस्था को कहते हैं। सामान्य तौर पर किसी स्वस्थ व्यक्ति का रक्त शर्करा खाली पेट जांच कराने पर 110 मिग्रा. से कम होना चाहिए और 75 ग्राम ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद 140 से कम होना चाहिए। यदि यह खाली पेट 126 या उससे अधिक और ग्लूकोज पीने के 2 घंटे बाद 200 या उससे अधिक हो तो उस व्यक्ति को मधुमेह रोग है। यदि यह खाली पेट 110 से अधिक और 126 के नीचे हो और ग्लूकोज के बाद 140 से 200 के बीच हो तो उसे हम बाधित ग्लूकोज निस्तारण (Impaired Glucose Tolerance; IGT) कहते हैं। एैसे व्यक्ति जो IGT के श्रेणी में आते है उनमें से करीब 70% आगे चलकर मधुमेह रोगी हो जाते है। सन 2007 में जहाँ मधुमेह रोगियों की संख्या 24.6 करोड़ थी वहीं IGT की संख्या 30.8 करोड़ थी। सन् 2025 में IGT की संख्या 41.8 करोड़ हो जायेगी। इस प्रकार यदि हम घोषित मधुमेह रोगियों एवं संभावित मधुमेह रोगियों (IGT) की संख्या जोड़ दें तो समस्या की प्रबलता और भी गंभीर हो जाती है।
यह अफसोस का विषय है कि सन् 1994 में 2010 के लिये जो भविष्यवाणी की गई थी उसे झुठलाने में हम नाकामयाब रहें। सन् 2025 के प्रस्तावित आकड़ो को यदि हमें झुठलाना है और चुनौती देनी है तो हमे गभीरंता पूर्वक आज के युवाओं को जिसकी उम्र 15 से 30 वर्ष के बीच है जागृत करना होगा, क्योकि 17 वर्ष बाद यही वर्ग 32 से 47 वर्ष की आयु में होगा और अधिकांश नये रोगी इसी वर्ग से सामने आयेंगें। अतः आज के बच्चों एवं युवाओं को हमे नियमित व्यायाम, उचित भोजन चयन, एवं जीवन शैली के प्रति न केवल जागरूक करना होगा, वरन सतत् निगरानी भी रखनी होगी और निरन्तर इस पर बल देना होगा। इस के लिये कई स्तर पर प्रयास करने होगें। जैसे पारिवारिक, शिक्षण संस्थाओं, कार्यालय आदि के माध्यम से हमें एक अभियान छेड़ना होगा जिसमें मीडिया की भूमिका भी अहम् होगी।
आइये अब हम यह देखते हैं कि मधुमेह किस प्रकार हमारे चिकित्सीय संसाधनो को चुनौती देगी-

  • मधुमेह रोगियों में मृत्यु दर दो गुनी अधिक है।
  • हृदय आघात की संभावना दो से चार गुनी अधिक है।
  • 17 – 20% रोगियों की मृत्यु 50 वर्ष से कम आयु में।
  • रोग होने के 20 वर्ष पश्चात लगभग सभी टाइप-1 मधुमेह रोगियो में और 60% से अधिक टाइप-2 मधुमेह रोगियों में आँख के पर्दे (रैटिना) में खराबी आ जाती है।
  • 86% टाइप-1 एवं 33% टाइप-2 मधुमेह रोगियों के अंधता का कारण रैटिना पैथी होती है।
  • टाइप - 2 मधुमेह रोगियों में 21% रोगियों को रोग का संज्ञान होने तक रैटिनोपैथी हो चुकी होती है
  • पैरों में सूनापन आने के कारण, पैरों में घाव, गैग्रीन एवं पैरो को कटने (Amputation) की दर में वृद्धि
  • 10-20 वर्ष के पश्चात् लगभग 30-50% टाइप-1 और 20 – 50% टाइप-2

मधुमेह रोगियों के गुर्दे में खराबी (Nephropathy) आ जाती है उन्हे ‘डायालिसिस’ और गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ने लगती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आने वाले समय में अच्छी संख्या में हमारे पास गहन हृदय चिकित्सा केन्द्र, डायालिसिस केन्द्र, नेत्र सम्बन्धी उपचार हेतु उच्चीकृत नेत्र चिकित्सा केन्द्र, पैर चिकित्सा केन्द्र आदि की सुविधा की आवश्यकता पडेगी। केवल चिकित्सा सुविधाओं के उपलब्ध होने से भी काम नहीं चलेगा वरन रोगियों को पैसे भी खर्च करने पडे़गे। संसाधनों के आभाव में सरकारी चिकित्सालयों की जो वर्तमान स्थिति है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अच्छे सुविधायुक्त केन्द्रों पर रोगियों का कितना दबाव होगा।
कालान्तर में श्रम न करने की प्रवृत्ति और उच्च वसा एवं उर्जा युक्त भोजन की प्रचुरता के कारण मधुमेह रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता है उसी प्रकार मधुमेह शहरीकरण, आद्यौगिकीकरण एवं आर्थिक विकास का दर्पण होता है यह कहने में अतिश्योक्ति न होगी।
समस्या की प्रबलता को देखते हुए बड़े पैमाने पर जन - जागरण अभियान की परम आवश्यकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुये डायाबिटीज सेल्फ केयर क्लब निरन्तर अपने मासिक बैठको के माध्यम से इस अभियान में लगा हुआ है और इस वर्ष ‘मधुमेह विजय’ नामक कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न स्कूलो में व्याख्यान एवं पोस्टर प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों के अन्दर इस रोग के प्रति जागरूकता अभियान चलाने जा रहा है। आइये हम सभी संकल्प ले कि इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिये हम अपने प्रयासों में कोई कमी नही आने देंगें।
डा0 आलोक कुमार गुप्ता
एम0डी0